Sunday, 11 January 2015

Gulab ka Phool.

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हमारी इस कहानी का नायक २८-२९ वर्षीय  सुदर्शन उच्च शिक्षा प्राप्त नवयुवक है  जिसका नाम सुकेतू है I  पिछले डेढ़ दो वर्षों से वह देश की एक वनस्पति विज्ञान से सम्बंधित प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्थान में कार्यरत है I कुछ दिन पहले उसके अधिकारी ने उससे कहा कि उसे नैनीताल के आस पास के इलाके में मिलने वाली कुछ विशेष  वनस्पतियों के अध्ययन हेतू  जाने वाली  ३-४ लोगों की टीम का  लीडर चुना गया है और अगले सप्ताह तक उसे टीम के साथ वहां जाना होगा I आदेशानुसार टीम के साथ सुकेतू अपने गंतव्य स्थल पर पहुंच गया I
उनके ठहरने का प्रबंध एक सरकारी गेस्ट हाउस में किया गया था जो  आबादी  वाले क्षेत्र से थोडा हट कर एक घाटी में था I गेस्ट हाउस के एकदम पीछे पूरब की ओर एक ऊँची पहाड़ी थी और पश्चिम में दूर तक हरा मैदान फैला था I उत्तर और दक्षिण में दूर तक  छोटी -२ भूरी पहाड़ियां फैली हुई  थी I चारों ओर चीड़ के पेड़ो की भरमार थी I गेस्ट हाउस के आस पास २०-२५ मकान थे I गेस्ट हाउस के बाईं ओर रिटायर्ड कर्नल राठौर  का घर था तथा दाहिनी ओर किसी किशन अस्थाना का निवास था I दक्षिण दिशा में थोड़ी दूर एक कोने में मिसेज़ ब्रगेंज़ा का कॉटेज था जिसे दूर से ही कोई भी घर पर  लगी बड़ी सी नेम प्लेट के कारण  आसानी से चिह्नित कर सकता था I वह कॉटेज में अकेली ही रहती थी I उनके पति पीटर का निधन दो वर्ष पूर्व हो चुका था  I
गेस्ट हाउस में सुकेतू और उसकी टीम का खाना बनाने के लिए तथा ऊपर के कार्य करने के लिए बहादुर नाम का व्यक्ति  नियुक्त था I वह उनका खाना बनाने के साथ उन्हेंआस पास के रहने वालों के विषय में भी छोटी मोटी जानकारी देकर उन्हें वहां के रहने वालों से जुड़े होने का थोडा अहसास सा दिलाता रहता था I  कुछ   दिन पहले  ही उसने बताया था कि कर्नल राठौर की लड़की जो बाहर  पढ़ती है आज कल छुट्टियों में यहाँ आई हुई है I यह सुनकर किसी भी युवा मन में उस लड़की को देखने की  उत्कंठा होना स्वाभाविक है अतः आजकल सुकेतू का गेस्ट हाउस के बरामदे में बैठना कुछ ज्यादा बढ़ गया I लेकिन उसके अथक प्रयास के बाद भी  उसे कर्नल राठौर की सुपुत्री के दर्शन तो नहीं हुए लेकिन उसे अपने इस बाहर  बैठने के दौरान एक सुन्दर लड़की के दर्शन अस्थाना जी के घर में जरूर हो गये I
अपनी आदतानुसार सुकेतू रोज प्रातः अकेला ही भ्रमण पर निकल जाता और वनस्पतियों के नमूने चुनने के साथ -२ प्रकृति का भरपूर आनंद भी लेता I इसी प्रक्रिया में वह एक दिन गेस्ट हाउस के ठीक पीछे पूरब की ओर स्थित पहाड़ी पर घूमने चला गया I पहाड़ी के ऊपर जाने वाली पगडंडी के साथ चीड़ के ऊँचे -२ पेड़ एक दूसरे से  ऊपर निकलने की स्पर्धा सी कर रहे थे I पेड़ो पर लिपटी  हुई  वन्य लताएँ हवा में झूल -२ कर अपने  अल्हड़पन का अहसास दिला रही थी I बादलों के छोटे-२ टुकड़े  कोमलता से बदन को छूकर अपने भीगेपन  का अहसास कराकर आगे बढ़ जाते I पहाड़ी की चोटी पर पहुँच कर सुकेतू वहां दूर तक फैले प्राकृतिक सौंदर्य को देख कर हतप्रभ रह गया और वहीं एक पत्थर पर बैठ कर उसका रसास्वादन करने लगा I
अब रोज प्रातः इस पहाड़ी पर भ्रमण के लिए जाना सुकेतू की दिनचर्या में शामिल हो गया I एक दिन जब सुकेतू पहाड़ी पर पहुंचा तो उसने उस पत्थर पर  जिस के ऊपर  वह अकसर बैठ कर प्रकृति को  निहारा करता था , एक लाल गुलाब रखा पाया I वहां पर  लाल गुलाब का फूल देखकर वह चौंका I उसने गुलाब का फूल उठा लिया और चारों ओर नज़र घुमाकर फूल रखने वाले को ढूँढने लगा लेकिन उसे वहां कोई भी नज़र नहीं आया I वह गुलाब का फूल हाथ में लिएपहाड़ी से  नीचे उतर आया लेकिन पूरे रास्ते भर उसकी नज़र उस गुलाब के  फूल  रखने वाले को ढूंढने का प्रयास करती रही I अब  चाहे इसे उसके युवा मन की  कल्पना कहिये, उसे पता नहीं ऐसा क्यों लगा कि शायद यह लाल गुलाब का फूल उसके लिए ही रखा गया है I लगातार  तीसरे दिन भी उसे ऊपर पहाड़ी पर लाल गुलाब  का फूल मिला जिसके कारण उसे विश्वास हो चला था कि कोई तो है जो रोज उसके लिए ऊपर जाकर गुलाब रख कर आता है I उसका मन उस व्यक्ति विशेष को ढूँढने के लिए व्यग्र हो उठा I उस गुलाब के फूल को साथ लिए वह पहाड़ी से नीचे उतर आया I वह  गेस्ट हाउस की तरफ बढ़ ही रहा था , तभी उसने एक खूबसूरत लड़की को  कर्नल राठौर के बंगले से निकल कर अपनी ओर आते देखा I वह लड़की उसके  पास पहुँच कर उसकी ओर  देख कर मुस्कराई और  आगे बढ़ गयी I उसके दिल की धड़कने तेज हो गई I उसे महसूस हुआ कि जैसे उसके पेट में ढेर सारी   तितलियाँ  उड़ रही हैं  I जब कुछ पल बाद वह थोडा सयंत हुआ तो उसके दिमाग में एक विचार कौंधा कि कही यह वही  लड़की तो नहीं है जो उसके लिए ऊपर पहाड़ी पर लाल गुलाब छोड़ कर आती है क्योंकि  वह बिना जाने पहचाने ही उसे देख मुस्कराई  थी I उसका मन एक अनजानी सी खुशी में डूबने उतराने लगा I
दूसरे दिन  जब सुकेतू पहाड़ी पर  भ्रमण करने गया तो उसे वहां लाल गुलाब तो मिला लेकिन लौटते समय उसके साथ एक और ऐसी घटना  घटी  जिसने उसके मन की उलझन को थोड़ा और जटिल कर  दिया I जब वह पहाड़ी से लौटकर गेस्ट हाउस की तरफ बढ़ रहा था तो उसने देखा कि अस्थाना जी के घर में रहने वाली युवती घर के बहार लगे पौधों में पानी दे रही है I वह सुकेतू को देखकर मुस्कराई तथा उसे गुड मोर्निंग कहा I सुकेतू ने उसे गुड मोर्निंग कहकर आगे बढ़ते हुए देखा कि क्यारियों में बहुत सुंदर लाल रंग के गुलाब  खिले है I अब  एक और नई दुविधा ने सुकेतू के मन को खटखटाना शुरू कर दिया कि कहीं लाल गुलाब का फूल  रखने वाली  अस्थाना जी के घर में रहने वाली यही युवती तो नहीं है ?
सुकेतू का पूरा ध्यान अब उन दोनों युवतियों के हावभाव परखने पर लगा रहता  , लेकिन वे  दोनों थी कि बाहर या तो बहुत कम दिखती और यदि दिखती भी तो सुकेतू के लिए ऐसा कोई सुराग नहीं छोड़ती जिससे वह इस बात का सही पता लगा सके कि उनमें से  कौन सी लड़की उसमें रुचि ले रही है I सुकेतू की व्याकुलता दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी और इसी कारण वह पिछली रात भली प्रकार  सो भी नहीं सका और जब देर रात आँख लगी तो सुबह आँख काफी दिन चढ़े पर खुली जिस वजह से वह प्रातः भ्रमण के लिए भी नहीं जा पाया I यद्यपि वह सांझ ढले घूमने नहीं जाया करता था लेकिन आज  साँझ ढले उसका चित पता नहीं क्यों  पहाड़ी पर जाने के लिए उद्ग्विन हो उठा और उसके पाँव स्वतः ही पहाड़ी की तरफ बढ़ गए I
हवा में ठंडापन था , अर्धचंद्र  अपनी चाँदनी बिखेरकर पृथ्वी के अँधेरे को मिटाने  का पूर्ण   प्रयास कर रहा था I सुकेतू  ने  पहाड़ पर पहुँच कर देखा कि जिस पत्थर पर वह जाकर बैठता था उस पर एक मानव आकृति पहले से ही बैठी है I यद्यपि चन्द्रमा का प्रकाश अधिक  नहीं  था लेकिन पास जाने  पर उसे इस  बात का अनुमान लगाने में तनिक भी परेशानी नहीं हुई कि  पत्थर पर बैठी मानव आकृति कोई  स्त्री है I  उसका दिल जोर से धड़कने लगा I  उसने अपने को सयंत किया और वहां से थोड़ा  हटकर एक पत्थर पर बैठ कर उस स्त्री की गतिविधियों पर नज़र रखने लगा I चारों ओर पूर्ण निस्तब्धता छाई हुई थी जिसे झींगुर रह -२ कर अपने संगीत से तोड़ने का प्रयास कर रहे थे I कुछ समय के पश्चात,  सुकेतू ने देखा कि वह नारी आकृति अपने स्थान से उठ कर खडी हो गई I कुछ क्षण उपरांत  उसके कानों  से  यें  शब्द टकराए :
“ पीटर मुझे तुम्हारा अभी और कितना इंतजार करना होगा ? तुम्हारा इंतजार करते -२ मैं थक गईं हूँ , अब तो  गुलाब रखने के लिए भी रोज नहीं आ पाती हूँ  , हे जीसस अब तुम्ही  मुझे पीटर के पास जाने में मदद करो “
इसके पश्चात उस आकृति ने  अपना हैण्ड बैग खोलकर कुछ निकाला  जो शायद गुलाब का  फूल था , जिसे उस आकृति ने अपने होठों से छूकर पत्थर पर रख दिया और फिर कुछ पलों के बाद  धीरे -२ पहाड़ी से नीचे उतरने लगी I
सुकेतू की तन्द्रा टूटी , उसे ज्ञात हो चुका था कि पहाड़ी पर गुलाब का फूल रखने वाली कोई और नहीं बल्कि मिसेस ब्रगेंज़ा हैं  जो अपने पति की याद में गुलाब का फूल पहाड़ी पर रख कर जाती हैं I
उसे लगा कि जैसे उसके दिल का कोई कोना खाली हो गया है I  कुछ देर तक  वह वहीं शांत खड़ा रहा और फिर भारी क़दमों से पहाड़ी पर से उतरने लगा I
गेस्ट हाउस पहुँच कर उसने पाया कि उसके सभी साथी खा पीकर सो गए है और बहादुर केवल उसके खाने के लिए ही जागा  हुआ है  I बहादुर ने उसका खाना मेज पर लगा दिया तथा कोने में पड़ी कुर्सी पर बैठ कर उसके खाना ख़त्म करने का इंतजार करने लगा I अभी सुकेतू ने  बड़े अनमने मन से  एक कौर ही मुंह में डाला था, तभी बहादुर ने उसे बताया कि  कर्नल की बेटी और अस्थाना जी की बेटी  आज शाम को ही अपनी पढाई पूरी करने के लिए शहर वापस चली गयी हैं I यह सुन कर सुकेतू के दिल में जो कुछ  रहा सहा भी था वह भी छन्न से  टूट कर बिखर गया  I उसने अपने  हाथ का कौर वापस प्लेट में ही रख दिया और खाने की मेज से उठकर बाहर बरामदे में बिछी कुर्सी पर आकर  धप्प से बैठ गया I

Kya Hota?

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कितना अच्छा होता जो  …………. मैं तेरे बिस्तर पर फूल बन बिछ जाती , कितना अच्छा होता जो  …………. मैं तेरी गर्म बाहों में खुद को छिपाती , कितना अच्छा होता जो  …………. तू मेरे अधरों का रस अपने अधरों पर लगाता , कितना अच्छा होता जो  …………. गर हम दोनों का मिलन  ………आज सदा के लिए हो जाता ।
यही सोचते-सोचते छवि कि आँखों से आँसू बहने लगे और क्यूँ न बहें ,जिसे उसने पिछले सात सालों से अपने तन-मन में बसा रखा था आज उसी की सुहागरात की सेज़ को सजाकर वो उसी के घर में तन्हाई में बिस्तर पर पड़े हुए अपनी रात काट रही थी । उसे नैतिक बहुत पसंद था , इतना कि उसके लिए एक दिन वो अपना सर्वस्व देने को भी तैयार हो गई थी मगर नैतिक उसके लिए अपने माता-पिता से बात तक नहीं करेगा ऐसा तो उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था । पर उसे पता नहीं अब भी रह-रहकर यही क्यूँ लग रहा था कि शायद बात कुछ और ही थी जिसकी वजह से नैतिक ने उससे शादी करने से इंकार कर दिया था और वो बात ना तो अब तक वह खुद और ना ही आशी दीदी समझ पाई थीं । पिछले दो हफ्ते से वह इसी तरह अकेले में ना जाने कितनी बार रोई थी मगर सबके सामने उसे अपने मन पर काबू रखना ही पड़ता था क्योंकि वो अपने नाकामयाब इश्क़ का और उपहास नहीं कराना चाहती थी । उसकी मम्मी भी शायद उसके दर्द को समझ रही थीं और  इसीलिए  उन्होंने उसको ये विश्वास दिलाया था कि वो नैतिक से ज्यादा अच्छा लड़का उसके लिए  ढूँढ़ेंगी और साथ ही दो बहनो का एक घर में जाने पर छोटी-छोटी बातों पर विवाद होने जैसी कई खामियाँ भी उसके आगे गिनवा चुकी थीं ,मगर छवि अपनी माँ की झूठी दिलासायों पर कुछ बोल ना पाती थी और मन ही मन अपने भाग्य को कोसने लगती थी ।
दस साल पहले नैतिक और छवि दोनों आशी दीदी और रितेश जीजाजी की शादी में ही तो पहली बार मिले थे । हर शादी की तरह उन दोनों का भी जूते छिपाने की रस्म को लेकर विवाद हो रहा था । छवि जीजाजी से और पैसे देने की माँग कर रही थी और नैतिक अपने भाई पर पैसे ना देने का दबाव बना रहा था । तभी छवि के दिमाग में एक युक्ति सूझी । उसने नैतिक को अलग ले जाकर अपनी टोली में शामिल कर लिया और सगन का आधा हिस्सा उसे भी देने का वादा किया । उस समय दोनों की बच्चा उम्र ही तो थी और जैसा कि बच्चे अक्सर पैसों के लोभी होते हैं इसलिए नैतिक भी छवि की बातों में आ गया । खैर अपनी साली को जीजाजी भला कैसे नाराज़ करते इसलिए उन्होंने उसे मुँह माँगी रकम दे दी । रकम पाकर दोनों खुश हो गए और तुरंत जाकर बाज़ार से अपने-अपने लिए एक-मोबाइल खरीद लाए । अभी तक घर में उन्हें कोई अपने मोबाइल को हाथ भी नहीं लगाने देता था पर अब शादी जैसे मौहल में कोई कुछ बोल ना पाया । बस तभी से उन दोनों के मोबाइल की कॉन्टैक्ट लिस्ट में एक-दूसरे का नाम सबसे ऊपर लिखा गया ।उस समय छवि दसवीं कक्षा में पढ़ती थी और नैतिक बारहवीं में । दोनों ही बोर्ड की परीक्षा देने जा रहे थे इसलिए अपनी पढ़ाई में दिन भर जुटे रहते थे । जब पढ़ते-पढ़ते थक जाते तो एक-दूसरे को फ़ोन मिला देते । बात शुरू तो पढ़ाई से होती थी पर ख़तम होते-होते उनकी बातों में एक अजीब सा रस आ जाता था ,शायद यही वो रस था जिसे अक्सर युवावस्था में पाने को युवा लालायित रहते हैं । धीरे-धीरे ये रस एक आकर्षण में  बदलने लगा और फिर प्रेम में ।
कॉलेज तक जाते-जाते दोनों में अब शारीरिक आकर्षण भी होने लगा , और इस आकर्षण को रोक पाना बहुत ही मुश्किल होता है । अब तो दोनों अक्सर कॉलेज से भाग जाते थे और किसी पार्क में घंटो पेड़ के नीचे बैठ अपने भविष्य़ के सपने बुना करते थे । मगर पता नहीं क्यूँ छवि को अब नैतिक में वो पहले वाला प्यार नज़र नहीं आता था । अक्सर वो मिलने आते ही उससे सिर्फ जिस्म की फरमाइश करने लगता था ,छवि हर बार मना कर देती थी तो नैतिक रूठ कर चला जाता था । धीरे-धीरे अब उन दोनों ने मिलना भी कम सा कर दिया था । छवि नैतिक की मनोस्थिति को समझती थी पर शादी से पहले वो ये सब नहीं करना चाहती थी । ऐसे ही एक दिन जब छवि ने नैतिक को अपने होठों को चूमने से हटाने की कोशिश की तो नैतिक ने बड़ी ही बेरहमी से उसके होठों को अपने दाँतों से काट दिया । बेचारी छवि रोती हुई काफी देर तक तड़पती रही मगर नैतिक से प्रेम जो कर बैठी थी , तो उसकी हर खता को उसे माफ़ करना ही था ।
अभी इसी साल दीवाली की बात थी ,छवि अपनी मम्मी के साथ आशी दीदी के घर मिठाई देने आई थी । सभी लोग ड्रॉइंग रूम में नीचे बैठे थे और नैतिक छवि को कंप्यूटर सिखाने के बहाने ऊपर अपने कमरे में ले गया था । कुछ देर प्यार भरी बातें करने के बाद , अचानक से ही नैतिक ने छवि के कपड़े उतारने शुरू कर दिए । पहले तो छवि कुछ समझ नहीं पाई क्योंकि वो भी तो कहीं न कहीं उसे प्यार करती ही थी , मगर अचानक से नैतिक का हाथ उसपर भारी पड़ने लगा । छवि ने घबराकर उसकी आँखों में जैसे ही देखा तो उसकी आँखों से एक वासना झलक रही थी । छवि डर गई ,उसने नैतिक को पूरे वेग से रोकना चाहा तो नैतिक ने ना केवल उसके कपड़े ही फाड़ दिए बल्कि शर्म से लाल हुए उसके गोरे  गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा भी जड़ दिया । छवि घबरा कर कमरे से बाहर की और दौड़ी । उसकी मोटी-मोटी आँखों से आँसू बह रहे थे ।पता नहीं वो नैतिक के इस रूप को अपने अंदर नहीं समेटना चाहती थी ।
नैतिक से उस दिन के बाद छवि ने कोई बात नहीं की और ना ही उसका ही कोई फ़ोन आया । छवि चाहती थी कि नैतिक खुद अपनी गलती का एहसास करे ,लेकिन नैतिक कुछ अलग ही स्वभाव का था । उसने कभी झुकना नहीं सीखा था ,और करीब दो हफ्ते के बाद आशी दीदी का उसके पास फ़ोन आया । वो कह रही थीं कि नैतिक की शादी पक्की हो गई है और नैतिक ने अपने माता-पिता की पसंद की लड़की से शादी करने का निर्णय किया है । यह सुनकर छवि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई । वो समझ ही नहीं पाई कि नैतिक ने ऐसा क्यूँ किया ?
छवि तुरंत ही आशी दीदी के घर जा पहुँची । नैतिक अपने कमरे में अकेला था । ऊपर जाते ही उसने नैतिक को अपनी बाहों में भर लिया और उससे लिपट कर रोने लगी । छवि ने कहा ,” तुम यही चाहते हो ना कि मैं शादी से पहले तुम्हे अपना सर्वस्व सौंप दूँ , तो आज मैं तुम्हे अपना सर्वस्व सौंपने आयी हूँ । मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती नैतिक । मुझे अपने से दूर मत करो । “
नैतिक पहले तो कुछ बोला नहीं मगर फिर बहुत देर बाद सोचने के बाद उसने कहना शुरू किया ,” जानती हो छवि ,मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूँ मगर अपनी मनः स्तिथि को मैं ही बेहतर समझ सकता हूँ ।मैं जैसा दिखता हूँ ना छवि , मैं वैसा हूँ नहीं । मैं यह बात अच्छी तरह से जानता हूँ कि अगर मैंने तुमसे शादी कर भी ली तो भी तुम मेरे साथ कभी खुश नहीं रह पायोगी । तुम मेरी भाभी की बहन हो इसलिए मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता । लड़की अगर कोई और हो तो कुछ फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन लड़की अगर जान-पहचान की होगी तो मेरे लिए रोज़ की एक समस्या रहेगी । वो शादी ही क्या जिसमे पुरुष अपने मन की इच्छा भी पूरी न कर सके । अच्छा ही हुआ जो तुमने अब तक खुद को मुझसे बचाए रखा । कम से कम जिस किसी के साथ भी तुम्हारी शादी होगी ,उसे तो अपनी दुल्हन पर गर्व होगा । ” इतना कहकर वह कमरे से बाहर चला गया और छवि वहीँ पर खड़ी काफी देर तक उसकी बातों में छिपे किसी गूढ़ अर्थ का मतलब खोजती रही ।
घर के सभी लोग शादी में जाने को तैयार खड़े थे । छवि को भी जाना ही था ,क्या कहती वो बेचारी ………. ना जाती तो दीदी बहुत बुरा मानती और फिर उसे भी नैतिक को ये दिखाना था कि वो उसके बिना भी जी सकती है । शादी भी संपन्न हो गई और नैतिक की दुल्हनिया “रूपा” भी दीदी की देवरानी बनकर घर में आ गई । रूपा बहुत ही सुन्दर थी, बिलकुल अपने नाम के अनुरूप लेकिन नैतिक से उम्र में पूरे दस साल छोटी थी । छवि यही सोच रही थी कि नैतिक ने इतना ज्यादा उम्र का अंतर अपने विवाह में क्यूँ रखा ? खैर अब वो अपने घर जाना चाहती थी मगर दीदी ने उसे एक दिन और रुक जाने को कहा और इसी वजह से उसे आज अपने ही प्रेमी की सुहागरात का बिस्तर सजाना पड़ा । छवि ने वैसे तो अपने दिल से नैतिक के साथ गुज़ारा वो सभी वक़्त एक हसीन सपना समझ कर भुला सा दिया था मगर पता नहीं क्यूँ जब वो रात को बिस्तर पर दीदी के साथ सोने लगी तब अचानक से ही ये पंक्तियाँ उसके मुँह से अनायास ही निकल पड़ी …………
कितना अच्छा होता जो  …………. मैं तेरे बिस्तर पर फूल बन बिछ जाती , कितना अच्छा होता जो  …………. मैं तेरी गर्म बाहों में खुद को छिपाती , कितना अच्छा होता जो  …………. तू मेरे अधरों का रस अपने अधरों पर लगाता , कितना अच्छा होता जो  …………. गर हम दोनों का मिलन  ………आज सदा के लिए हो जाता ।
शायद किसी ने ठीक ही कहा है कि दिल की चोट का ज़ख्म इतनी आसानी से नहीं भरा करता, अक्सर वो एक नासूर बनकर हमारे दिल के किसी कोने में छिपकर बैठ जाता है और समय-समय पर रिस कर अपने होने का दर्द दे जाता है । आज छवि की पलकें भी उसी दर्द के घाव से भीगी हुई थीं और उसी को याद करते-करते वो बिस्तर पर ना जाने कब अपनी आँखें बंद करके सो गई ।
सुबह नैतिक के कमरे से आते शोर की आवाज़ सुनकर उसकी भी एकदम से नींद टूट गई । उसने फटाफट से अपने सिरहाने रखा दुपट्टा उठाया और ऊपर की ओर भागी । वहाँ जाकर देखती है तो रूपा आशी दीदी की बाहों में लेटी तड़प रही थी और सारा बिस्तर खून से लाल था । नैतिक अपने बिस्तर पर ही औंधा मुँह किये हुए नींद और शराब के नशे में धुत पड़ा था और आशी दीदी अपने ही मन में बड़बड़ा रही थी ,” पत्नी सिर्फ एक रात के लिए ही पुरुष की अर्धांगनी नहीं बनती ,बल्कि सारे जीवन के लिए अपना घर छोड़ कर अपने पति के घर आती है , इसलिए पुरुष को भी ये समझना चाहिए कि पहली रात वो उसके साथ उतना ही भोग-विलास करे जितना कि वो सहन कर पाए । नैतिक ने तो उसे किसी जंगली जानवर की तरह नोच डाला । अगर इसी मानसिकता के साथ वो अपनी सारी ज़िंदगी उसके साथ गुज़ारेगा तो बहुत जल्द ही रूपा जैसी रूप सुंदरी अपनी ज़िंदगी से हाथ धो बैठेगी । “
अब मुझे नैतिक की कही उन गूढ़ बातों का अर्थ समझ में आ रहा था । हाँ , वो सच में जैसा दिखता था वैसा वो बिलकुल भी नहीं था । बार-बार मेरी नज़र रूपा के चेहरे पर टिक रही थी मानो उसका दर्द कहीं मुझमें समा रहा हो और मेरे मन -मस्तिष्क पर ये पंक्तियाँ उभर कर मेरे ज़हन को कहीं अंदर तक कुरेद रही थीं ……………
क्या होता अगर  ………मैं तेरे बिस्तर पर फूल बन बिछ जाती ?
क्या होता अगर  ………मैं तेरी बाहों में अपनी फाँसी का फंदा पाती ?
क्या होता अगर  ………तू मेरे अधरों को अपनी वहशियत से काट जाता ?
क्या होता अगर  ………हम दोनों का मिलन  ………कल रात सदा के लिए हो जाता ??????

Antaratma ki Aawaj

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Hindi Moral Story – Antaratma ki Aawaj
Photo credit: rajeshkrishnan from morguefile.com
जिंदगी में हम सभी अक्सर जल्द सफ़लता हासिल करने या बिन मेहनत सबकुछ जल्द पाने के चक्कर में शोर्ट कट रास्ता अपनाने के फ़िराक में रहते हैं लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि सफ़लता कभी शोर्ट कट से नही बल्कि कड़ी मेहनत और ईमानदारी से मिलती हैं. वैसे तो मैं पढ़ाई में अच्छी थी लेकिन मुझे रिसर्च एंड स्टैटिक्स के पेपर से बेहद डर लगता था इसलिए पेपर काफी नजदीक होने पर मैं काफी डरी हुई थी. नीरज भैया यूँ तो हमारे पारिवारिक मित्र थे पर साथ ही वो मेरी यूनिवर्सिटी में भी कार्यरत थे इसलिए मेरी हरसंभव मदद करने हेतु हमेशा तत्पर रहते. उसी दौरान नीरज भैया का फ़ोन आया.
“हेलो नीरा ! कल गोविन्द भैया आ रहे हैं. इस बार रिसर्च का पेपर उन्होंने ही बनाया हैं और कल तुम्हारे घर भी आयेंगे. पेपर कॉपी कर लेना बस तुम्हारा काम हो जायेगा. ”
(खुश होते हुए) ” अरे वाह भैया ! इस बार मुझे तो 100 परसेंट मार्क्स मिलने वाले हैं तब तो ! थैंक यू सो मच भैया ! बाय ”
“बाय ”
मेरी ख़ुशी उस वक़्त चरम सीमा पर थी और जो डर था वो काफी हद तक जा चुका था और इसी चक्कर में जो किताब पढ़ भी रही थी उसे उसी समय बंद कर टेबल पर पटक कर बेपरवाह सी टीवी देखने में मस्त हो गई. उस वक़्त लालच ने मन में घर कर लिया था कि ” अगर मुफ्त में कोई चीज मिल रही हो तो एक्स्ट्रा मेहनत कौन करना चाहेगा और जब पेपर हाथ में आएगा तब पढ़ लेंगे ‘ वाले ख्याल में मैं भूल गई कि परसों मेरा पेपर हैं और मुझे अभी केवल अपनी पढ़ाई पे ध्यान देना चाहिए. पूरा दिन यूँ ही बेफिक्री में निकल गया और दूसरे दिन गोविन्द भैया पेपर ले कर आये. मैंने फटाफट पेपर कॉपी किया और भैया को बहुत सारा धन्यवाद बोला. उनके जाने के बाद मैंने सिर्फ उन्ही प्रश्नों की तैयारी की और अगले दिन परीक्षा देने गई. परीक्षा हॉल के बाहर बार बार किताब झांकते हुए बच्चे किसी बेवकूफ़ से कम नही लग रहे थे उन्हें देख कर मैं मंद मंद मुश्कुरा रही थी. उस वक़्त इतनी ज्यादा अतिउत्साहित थी जैसे इस बार मैं ही टॉप करने वाली हूँ.
परीक्षा शुरु होने की पहली घंटी लग चुकी थी और हम सब अपने अपने रोल नंबर के हिसाब से अपनी सीट ढूंढकर बैठ गए. बैठते ही सर पेपर और कॉपी वितरित करने लगे. जब पेपर मेरे पास आया तो उसे देखते ही मेरे तो होश ही उड़ गये. ‘अरे ये क्या ! ये वो पेपर नही था जिसकी मैं तैयारी कर के आयी थी. ‘ मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई और आँखों के सामने अँधेरा सा छा गया. कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या करूँ और क्या लिखूं. परीक्षा विभाग ने पूरा प्रश्न पत्र ही बदल दिया था. आधे घंटे तक सुन्न रहने के बाद खुद को सँभालने की कोशिश की और प्रश्नों पर गौर किया तो उसमे एक दो वही प्रश्न थे जिन्हें बीच में ही पढ़ना बंद कर दिया था. किसी तरह पेपर करने के बाद बाहर आयी. उस वक्त मैं बहुत ज्यादा सदमे में थी क्योंकि मेरे साथ धोखा हुआ था और मेरा पूरा पेपर बिगड़ चुका था.
” हेय नीरा ! सुनो तो तुम्हारा पेपर कैसा हुआ ? ”
कंचन ने पीछे से आवाज दी और रुक कर मैंने बोझिल स्वर में बोला ,
” यारर…मत पूँछों पेपर बहुत कठिन आया था इसलिए बिगड़ गया और तुम्हारा कैसा हुआ ? ”
“हा ! थोड़ा कठिन था लेकिन ठीक गया. पास तो हो ही जायेंगे और वैसे भी मुझे कौन सा टॉप करना हैं. “(हँसते हुए)
मैंने भी उसकी बात पर बेमन सा मुश्कुरा दिया और अकेले रहना चाहती थी इसलिए उसे जल्दी बाय बोल कर घर की ओर निकल गई. घर आते ही सब ने पूंछा पेपर के बारे में क्योंकि सबको यकीन था कि पेपर बहुत ज्यादा अच्छा जायेगा लेकिन सब उसके विपरीत हो गया था. मेरा उतरा मुंह देख कर माँ तो समझ गई और पूंछने लगी,
” पेपर अच्छा नही हुआ क्या? क्या हुआ ? कुछ तो बोलो. ”
” हा माँ ! पूरा पेपर ही खराब हो गया क्योंकि वो प्रश्न ही नही आये जो भैया बना कर लाये थे.”
और इतना बोलते ही मैं फूट फूट कर रोने लग गई. मेरी हालत देख कर माँ को कुछ और पूंछना ठीक नही लगा और मुझे गले लगा कर समझाने लगी.
” कोई बात नही बेटा ! पेपर कभी कभी बिगड़ जाता हैं और इसमें इतना रोने वाली क्या बात हैं अगली बार खूब सारी मेहनत करके देना बढ़िया पेपर जायेगा. ठीक हैं अब रोना बंद करो जल्दी से. ”
ऐसा पहली बार हुआ था कि मेरा पेपर ख़राब हुआ था इसलिए उदास और दुखी रहने लगी. परीक्षा ख़त्म होने के बाद इस बार कही भी घूमने नही गई.

परीक्षा ख़त्म होने के बाद सारे विभाग कॉपियां जांचने दूसरे विश्वविद्यालय भेजा करते थे. एक दिन नीरज भैया जल्दी में भागते हुए मेरे घर आये.
” नीरा ! नीरा ! जल्दी बोलो तुम्हे रिसर्च का पेपर दुबारा से लिखना हैं या नही ”
” भैया ! मेरी कुछ समझ में नही आ रहा हैं आप क्या बोल रहे हैं ? ”
” देखो नीरा ! तुम्हारे घर के बाहर जो वैन खड़ी हैं उसमें तुम्हारे उसी विषय की कॉपियां रखी हुई हैं जो बिगड़ गया था. तुम्हारे पास एक मौका हैं पेपर सुधारने का और वक़्त बहुत कम हैं जो भी करना हैं जल्दी करो. बोलो तो तुम्हारी कॉपी अंदर ले कर आऊ या तुम खुद ले आओगी? तुम बस लिख लो जल्दी से ! ”

यह एक सुनहरा मौका था जो मेरे पास खुद चल कर आया था और उत्साह में आकर मैं जल्दी से उठ कर गेट के पास आ भी गई लेकिन अचानक मेरे कदम वही पर ठिठक गये. मेरे और उस कॉपी के बीच महज दो कदम के फ़ासले के बीच कोई दीवार बनकर आ खड़ा हुआ था जो मुझे ऐसा करने से रोक रहा था. मेरी अंतरात्मा ! जो चीख चीख कर मुझे बार बार समझा रही थी और जो मेरे गलत पड़ते कदमों को रोक रही थी. मेरे अंदर एक अंतर्द्वंद सा चल रहा था. मन कुछ कह रहा था और आत्मा कुछ और. अचानक पीछे मुड़ी और तेज क़दमों से वापिस अंदर आ गई. सब मुझे आश्चर्य से देखने लगे.
” क्या हुआ नीरा ? वापिस क्यों आ गई? तुम्हे पास होना हैं न ! तो जाओ ले कर आओ. ज्यादा समय नही हैं अपने पास.”
“नही भैया ! मुझसे ये नही होगा. मुझे पास होना तो हैं किन्तु इस तरह चीटिंग कर के नही. मैं दुबारा दुगनी मेहनत कर बैक पेपर दे सकती हूँ लेकिन ऐसे गलत काम कर के मैं अपनी नज़रों में नही गिरना चाहती. ठीक हैं ऐसे करने से मैं पास हो तो जाउंगी पर मन का सुकून और आत्मविस्वास दोनों कहाँ से लाऊंगी जो मुझे मेरी मेहनत से मिलेंगे…आई ऍम सॉरी भैया !”
अचानक सब गुस्से में मुझपर बरस पड़े और मुझे बार बार प्रेरित करते रहे कि मैं दुबारा अपनी ग़लती सुधारुं. लेकिन एक गलती सुधारने के लिए दूसरी ग़लती ! वो मैं कैसे कर सकती थी भला ! इसलिए अंत तक अपनी बात पर अडिग रही. सब मुझसे नाराज़ जरुर हो गए पर मेरे अंदर जो एक शोर एक अंतर्द्वंद था वो अब ख़त्म हो चुका था. इस में जीत अंतरात्मा की हुई थी और मुझे मेरे अंदर एक असीम शान्ति का एहसास हो रहा था.
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Aashtha

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मेरी आयु उस समय लगभग ७-८ वर्ष की होगी I मेरा परिवार उत्तराखण्ड  के एक छोटे से शहर रुड़की में रहता था I हमारा घर शहर की एक जानी पहचानी गली ” पत्थर वाली गली”  में स्थित था I १० -१२  फीट चौड़ी  गली के दोनों ओर  लगभग ५० -६० मकान थे जिनमें विभिन्न तबके और जाति के मध्यम वर्गीय लोग बसे थे I गली में कभी बरफ के गोले वाला , कभी अनारदाने का चूरन बेचने वाला या कभी चना जोर वाला गली में आवाज़ देकर कर बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करता रहते थे I कभी -२  बन्दर या भालू का नाच दिखाने वाले भी आकर हम बच्चों का मनोरंजन करते थे I इन सब के अतिरिक्त  हमारी गली में भीख  मांगने  वाले भी अकसर चक्कर लगाया करते थे I उनमें से कुछ तो यदा कदा ही आया करते थे लेकिन एक या दो नियमित  थे I अधिकतर भीख मांगने वाले फटे चिथड़ों में  ही होते थे लेकिन उनमें से  एक का पहनावा कुछ अलग था I
वह एक जोगिया रंग की धोती पहनता था तथा उसी रंग की एक चादर से ऊपर  का शरीर ढके रहता था I साथ ही एक बड़ा लोहे का बड़ा चिमटा , लकड़ी का एक कमंडल तथा ६-७ लीटर  की एक लोहे की बाल्टी भी उसकी रोज की वेशभूषा का एक हिस्सा थे I हम सब बच्चे उसे बाबा जी कह कर संबोधित करते थे I मेरी मां ने मुझे बताया था कि ऐसे जोगिया रंग के वस्त्र वही लोग पहनते है जो इस दुनिया से विमुख होकर सन्यासी बन जाते है और केवल लोगों के भले के लिए ही कार्य करते है I उस समय   मेरी बाल बुद्धि के लिए इतना जान लेना  ही काफी था I
बाबा जी अकसर दोपहर के १ बजे के आसपास भिक्षा मांगने आते थे I इस समय तक अकसर घर के पुरुष और बच्चे भोजन कर चुके होते थे I मुझे ऐसा लगता था या यूँ कहा जाये कि ऐसा मेरा अनुमान था कि गली के प्रत्येक घर से उन्हें कुछ न कुछ भिक्षा में अवश्य मिलता होगा क्योंकि हमारे घर तक  ,जो कि गली के एक छोर पर था , पहुँचते -२ बाबा जी की बाल्टी और कमंडल पूरी तरह भोजन सामग्री से भरे होते थे  या यह भी हो सकता है कि बाबाजी आसपास की गलियों से भी कुछ भोजन सामग्री एकत्र करने के उपरांत  हमारी गली में भिक्षा के लिए आतें हो I प्रतिदिन उनकी ढेर सारी एकत्रित भोजन सामग्री को देख कर मेरे बाल मन में कई   प्रश्न बार-२ सिर उठाते थे , जैसे  बाबाजी अकेले ही खाने वाले है तो इतनी ढेर सारी भोजन सामग्री क्यों एकत्रित करते हैं  और यदि करते हैं तो इसका क्या उपयोग करते हैं या इसे ऐसे ही फेंक देते है I मेरे इन प्रश्नों का उत्तर मुझे एक दिन मिल ही गया I
जाड़ा अपने पैर फैला चुका था I कोहरे के कारण अकसर सूर्यदेव के दर्शन देर से ही होते थे I हम सब बच्चे धूप निकलने का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते ताकि बहार खेलने के लिए जा सके I  सूर्यदेव या तो कभी  घने कोहरे के कारण अपने दर्शन देने में बिल्कुल असमर्थ हो जाते या कभी सुबह प्रातः ही कोहरे का सीना फाड़  उदित हो कर  हम बच्चों को खेलने का सुअवसर प्रदान कर देते I ऐसे  ही एक दिन जब धूप  भली प्रकार खिली थी, मैं अपने दोस्तों के साथ खेलता हुआ गली से काफी दूर निकल गया I रास्ते में एक स्थल पर मैंने बाबाजी को भिक्षा मांग कर एकत्रित की गयी भोजन सामग्री के साथ देखा I कोई १०-१५ लोग उनके आस पास मौजूद थे I उन लोगों के पहनावे को देख कर ऐसा लगता था जैसे वो सब मजदूरी करने वाले लोग हैं I मैंने देखा कि अपनी भोजन सामग्री  में से बाबाजी उन सबको भोजन वितरित कर रहें हैं I यह देख कर मेरे बाल मन को बहुत अच्छा लगा कि एक सन्यासी भिक्षा में मिलें भोजन को उन गरीब लोगों में  बाँट  रहा  है जो शायद किसी कारणवश अपने लिए आज का भोजन नहीं जुटा  पायें हैं I बाबा जी की एक सुंदर छवि मेरे बाल मन पर अंकित हो गई I
कुछ दिनों के बाद मेरा परिवार दूसरे शहर में जा कर बस गया तथा मुझे रुड़की आने का लम्बे समय तक अवसर नहीं मिला I १० वर्ष के अन्तराल के बाद मुझे अपने इंजीनियरिंग में दाखिले के सिलसिले में रुड़की जाने का अवसर मिला I मेरे मन में अपने बचपन के दोस्तों से मिलने की बहुत उत्कंठा थी  लेकिन रुड़की पहुँच कर मैं केवल अपने एक दो मित्रों से ही मिल पाया क्योंकि अधिकतर  मित्र  पढाई के लिए  दूसरे शहरों में चले गए थे I बचपन की यादों को ताज़ा करने के लिए मैंने शहर के विभिन्न जगहों पर  जाने  का विचार किया I घूमते -२ मैं उस स्थल पर भी जा पहुंचा जहाँ पर मैंने बाबाजी को लगभग १० वर्ष पूर्व लोगों को भोजन बांटते हुए देखा था I मैं इसे संयोग ही कहूँगा  कि जैसे ही  मैं वहाँ पहुंचा तो मैंने पाया कि बाबाजी वहां पहले से ही  उपस्थित थे  I यद्यपि समय उनके चेहरे पर अपने चिन्ह छोड़ चुका था लेकिन मुझे उनको पहचानने में  तनिक  भी  कठिनाई नहीं हुई I पहले की तरह उनके आस पास कुछ लोग मौजूद थे जिन्हें बाबाजी खाना दे रहे थे लेकिन इस बार मैंने एक विशेष बात पर गौर किया कि बाबाजी जब भी  किसी को भोजन देते थे तो वह उस व्यक्ति से बदलें में  कुछ पैसे भी  लेते थे I मैं, बाबाजी और उनके आस पास बैठे लोगों के बीच भोजन और पैसों के उस आदान प्रदान को देख कर अचंभित था I बाबाजी का एक नया रूप मेरे सामने था I एक सन्यासी आज मेरे सामने एक व्यापारी के रूप में खड़ा था I
बाबा जी का यह नया रूप देख कर , बचपन में उनके प्रति बनी मेरी आस्था आज अचानक खंडित होकर  बिखर  गयी  I
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Dawai

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Hindi Moral Story – Dawai
Photo credit: mensatic from morguefile.com
हालाँकि वारीश की रफ़्तार थोड़ी कम हो गयी थी, इसीलिये मैंने बूढ़े बाबा को main रोड से अपनी कार मोड़ने के पहले उतार कर कहा था, “बाबा ठीक से घर तो पहुँच जाओगे,…” ,
‘हाँ बाबू, तूने इस वारीश में इतना कर दिया यही काफी है। अब ये दवाई मेरी पोती की जान जरूर बचा लेगी ।”
मैं घर पहुंच कर भी थोड़ा अन्यमन्यस्क सा था। पत्नी ने देखते ही समझ लिया था कि जरूर कोई गंभीर समस्या से परेशान हो रहे हैं। पतियों के चेहरे के भाव पढ़कर ही पत्नियां अक्सर उनकी परेशानियों से खुद को परेशान करने लगती हैं। मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है।
“क्या हुआ है? आप बताएँगे नहीं तो बात साफ कैसे होगी? मेरे साथ समस्या को साझा करते ही उसका हल निकल आएगा …. आप बताएं तो सही। वगैरह वगैरह….”पत्नी ने एक साथ कई सवाल, उसके संभावित जवाब सहित कह दिए और मेरे जवाब की प्रतीक्षा करने लगी।
कभी कभी सचमुच ऐसा होता भी था की समस्या को उन्हें बताते, समझाते उसका कोई न कोई हल भी निकल आता था। लेकिन मैं बताने से परहेज इसलिए करता था कि मैं अपनी परेशानियों से उन्हें क्यों परेशान करू। मेरी परेशानी मेरी निजी सम्पति है जो मैं अपने पास ही रखना चाहता हूँ।
इस परेशानी की भी ज्यादा बात नहीं करते हुए मैंने कहा, “अरे भई, कुछ नहीं, वारिश में आया हूँ, गरमा-गरम चाय का तलबगार हूँ, और आप परेशानियों की बात बीच में घुसेड़ रहे है।” मैंने हंसकर कहा तो पत्नी मान गयी और चाय की तैयारी में लग गयी. लेकिन मैं बड़ी सफाई से अपनी परेशानी को छुपाने में सफल रहा था।
मैंने जैसे-तैसे चाय ख़त्म की. कार बाहर ही खड़ी थी। कार को मोड़कर मैं फिर मेन रोड के तरफ चल पड़ा जहाँ पर आते समय मैंने बूढ़े बाबा को छोड़ा था ।
ड्राइव करते हुए आज की सारी घटनाएँ घूम रही थी। मैं आज कारखाने से थोड़ा विलम्ब से निकला था। पिछले दो दिनों की लगातार वारिश के बाद आज दिन भर वारिश नहीं हुयी थी। लोगों ने राहत महसूस की थी। यह चारो तरफ पहाड़ियों से घिरा एक छोटा सा शहर दो नदियों, सुरेखा और चिकाई का बीच बसा था। सुरेखा और चिकाई नदियां शहर के दो तरफ से बहते हुए दक्षिणी छोर पर मिल जाती थी। उसके आगे सिर्फ सुरेखा नदी बनकर बहती जाती थी। खनिज सम्पदा के भंडार के कारण कारखाना भी यहीं स्थापित हो गया था। कारखाने की दीवारों से करीब दो किलोमीटर दूर कर्मचारियों और अधिकारीयों के पक्के घर बनाये हुए थे। उसी से थोड़ी दूर पर बस्ती थी ग्रामीणो की, जो शहर में मज़दूर और कारखाने में ठेका मज़दूर के सप्लाई पॉइंट के रूप में काम करते थे। बस्तियों की ब्यवस्था शहरों जैसी तो नहीं थी, लेकिन गलियां सीमेंट की बन गयी थी जब कि मकान अधिकांश मिट्टी और खपड़ैल के ही बने थे। हाँ, बस्तियों में रहने वाले लोगो के लिए काम की कमी नहीं रहती थी , क्योंकि शहर भी बड़ा हो रहा था और कारखाना भी।
मुझे कारखाने से निकलते – निकलते रात के नौ बज गए थे। ऐसा किसी विशेष कारण से होता है जब या तो कोई ब्रेकडाउन हो या बॉस कोई मीटिंग सात बजे बुलाये और वह रात के नौ बजे तक खींच जाये। दोनों ही स्थितियां कारखाने से विलम्ब के लिए काफी हैं। लेकिन आज मेरे विलम्ब से निकलने का कारन ऊपर के दोनों कारणों से अलग था। पिछले दो दिनों की लगातार वारिश के कारण कारखाने में जगह –जगह जल जमाव को ठीक करना जरूरी था ताकि उसके कारण कररखाने में कच्चे माल की सप्लाई में कोई बाधा न हो। साथ ही रात भर बिना ब्रेकडाउन के कारखाना चलता रहे और मैं आज की रात अच्छी नींद ले सकूँ।
वारिश के दिनों में पहाड़ियों से घिरे इस शहर का सौंदर्य दुगना हो जाता है। हरियाली की चादर ओढ़े पहाड़ और उसपर झुके हुए बादल जैसे किसी नयी – नवेली दुल्हन को आगोश में लिए हुए हों। प्रकृति का यह संवरा – निखरा रूप किसी भी प्रकृति प्रेमी को भाव – विह्वल किये बिना नहीं रह सकता । किन्तु जब यही वारिश लगातार कई दिनों तक होती रहे तो पहाड़ काल से प्रतीत होते हैं। नदियों के जल से भरे हुए दोनों किनारे विकराल जैसे लगने लगते हैं। दिन में जो पहाड़ और नदी सौंदर्य – बोध के प्रेरक होते है , शाम के घिरते ही भयानक हो जाते है. यहाँ के वारिश की एक खासियत है , बौछारें आती हैं तो खूब तेज़ हवाओं के साथ जैसे पेड़ों को उखाड़ देंगे और पहाड़ों को पछाड़ देंगे।
आज भी ऐसा ही हुआ। मैं कारखाने का काम निपटाने के बाद रात के करीब नौ बजे के आसपास गाड़ी निकालकर घरके लिए रवाना हुआ था। जैसे ही कारखाने के गेट से बाहर निकला कि काले बादलों से आकाश भर उठा था। जोर की वारिश के संकेत आने लगे थे। जैसे – जैसे मैं घर के तरफ बढ़ने लगा , अचानक तेज बौछारें शुरू हो गयी, तेज हवाएँ भी साथ आ रही थी , तूफानी मंजर था , पेड़ झूम रहे थे और कार पर लगातार पड़ती तेज बूंदों को वाइपर से किसी तरह काटते हुए हेड – लाइट के प्रकाश में मैं धीरे – धीरे बढ़ रहा था। ऐसे समय में बिजली विभाग अक्सर बिजली की लाइन काट देता है ताकि बिजली के उलझे , झूलते तार जो सरकारी बिजली विभाग की गुणवत्ता और प्रबंध क्षमता के जीते – जागते प्रमाण हैं , उनपर पर्दा पड़ा रहे।
मैं एक दो किलोमीटर ही आगे बढ़ा था कि मैंने देखा सारी दुकाने बंद हो चुकी थी। कुछ दवा की दुकाने खुली थी। उनकी अपनी प्रकाश ब्यवस्था के कारण प्रकाश नजर आ रहा था। इतने में अचानक बीच सड़क पर हेड लाइट के प्रकाश में एक ब्यक्ति दिखाई दिया। कार के नजदीक पहुचने पर मैंने देखा कि वह अपनी धोती आधी ऊपर उठाये , टूटे हुए छाते जिसकी कमानी लगता है इस आँधी तूफ़ान में टेढ़ी हो गयी थी और उसपर चढ़ा कपड़ा तार – तार हो गया था , किसी तरह बाहों और छाती के बीच समेटे बीच सड़क पर चला जा रहा था। मैं बिलकुल नजदीक साइड में कार करके अचानक कार रोकी , शीशे को थोड़ा नीचे करके जोर से आवाज दी ,” बीच सड़क पर क्यों चल रहे हो ? इस तेज बरसात में किसी गाड़ी से कुचलकर जान देने का इरादा है क्या?”
उस ब्यक्ति ने मेरी आवाज सुनकर जब अपनी गर्दन घुमाई तो मैंने देखा की सत्तर वर्ष के आसपास का एक बूढा आदमी अपने चश्मे पर पड़ी बूंदो को पहने हुए ही हाथ से साफकर बोला , “माफ़ करना बाबू ! पानी चारो तरफ इतना भरा है कि सड़क का कहीं पता ही नहीं चल रहा है। फिर वह मन – ही – मन बुदबुदाने लगा ” नहीं बचेगी , लगता है नहीं बचेगी। ……”
मैंने फिर शीशा नीचे किया और पूछा ,” क्या हुआ , क्या बुदबुदा रहे हो बाबा ?”
” बाबू यह दवा नहीं मिली तो वह नहीं बचेगी..”
फिर पता नहीं क्यों मेरे भीतर से एक आवाज आई और उसे मैंने कार के अंदर आ जाने को कहा, कार की सीट पर मैंने आफिस के पुराने कुछ पेपर और पुराने अख़बार के टुकड़े बिछा दिए ताकि सीट अधिक गीला न हो जाय ,” बाबा कार के अंदर आ जाओ। ”
कुछ झिझकते हुए बूढ़े बाबा अंदर आ गए। वारिश अभी भी उसी गति से लगातार जारी थी। सड़क पर घुटना भर पानी जमा हो गया था। इस स्थिति में कार ड्राइव करना मुश्किल हो रहा था। चार या पांच मीटर से आगे कुछ नजर नहीं आ रहा था। पहाड़ो पर लगातार वारिश की विकरालता का सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता था। बौछारों का जोर और कार के शीशे पर पड़ने वाली बूंदों का शोर दोनों ही इस तूफानी रात का साथ दे रहे थे।

“बाबा क्या हुआ ? आप बुदबुदा रहे थे…, नहीं बचेगी , नहीं बचेगी। ” मैंने अपनी उत्सुकता जताई थी ।
“बाबू क्या आप मेरी मदद करोगे? ” उसके सवाल में अनुरोध और निराशा – मिश्रित जवाब की तैयारी दोनों ही दिखाई दे रहे थे।
“जरूर , आप बोलो तो सही… ।” मैं उसकी कातर नेत्रों से झांकते मदद के लिए मौन निमंत्रण को ठुकरा नहीं सका। पत्नी को मैं पहले ही फोन कर चुका था कि मैं लेट से आऊंगा। इसलिए उधर से किसी तरह की जल्दी घर पहुंचने की निरंतर अनुरोध की संभावना कम थी। और भी कहीं से कोई फोन आने वाला नहीं था।
“मैं अपनी पोती के लिए दवा लेने निकला था। शाम को डाक्टर को दिखाया था। उसने कहा था कि दवाक़फ़ बहुत ज्यादा है। जल्दी से यह दवा लेकर दीजिये नहीं तो रात में अगर साँस लेने में दिक्कत बढ़ गयी तो जान भी जा सकती है।” बाबा एक ही साँस में बोल गए थे।
मैंने पूछा ” कोई दूकान में दवा नहीं मिली क्या? ”
“बहुत सारी दुकानें बंद मिली। अब मैं कहाँ से दवा लाऊँ ?” उनकी आवाज थरथरा रही थी। वेदना का सागर उमड़ पड़ा था।
मेरा मन द्रवित हुए बिना नहीं रहा। मैंने ठान लिया कि कम – से – कम दवा खरीदने में तो इनकी जरूर मदद करूंगा। मैंने कार मोड़ दी। मैं जानता था कि ऐसे मौसम में दो ही जगह दवा मिल सकती है , एक गुरु नानक देव क्लिनिक के दवा काउंटर पर और दूसरे स्माइल लाइन मेडिकल में। क्लीनिक नजदीक होने के कारण मै उसी तरफ कार मोड़ कर बढ़ता गया।
बीच में सड़क पर पानी काफी जमा हो गया था। वारिश अभी भी लगातार उसी गति से जारी थी , मानो कोई आसमान में छेद कर दिया हो। पिछले दो दिनों की वारिश से ऐसे ही दोनों नदियां खतरे के निशान तक छू लेना चाह रही थी। आज की वारिश के बाद तो जरूर बाढ़ प्रबंधन वाले नदी में ऊपर के तरफ बंधे बाँध का पानी छोड़ देंगे और फिर शहर में नीचे बसे लोगो को ऊँचे स्थानों में जाने के लिए अलर्ट जारी किया जाएगा। प्रशासन का काम इसके बाद लगभग ख़त्म, आदमी का जल जमाव से जूझने का काम शुरु। यह हर वर्ष होता था और इस वर्ष भी होगा। मैं यह सब सोचता हुआ कार बढ़ाये जा रहा था। सड़क पर इक्के – दुक्के कार या ऑटो वाले ही नज़र आ रहे थे। अन्यथा सड़क बिलकुल सुनसान थी।
” कहाँ रहते हो बाबा?” मैंने बाबा के अंदर चल रहे विचारों की हलचल के मौन को तोड़ते हुए पूछा था।
” बस ‘नीहारिका’ टावर कैंपस के बगल से जो रोड नीचे के तरफ बस्ती में गयी है उसी में रहता हूँ। ” बाबा ने कहा था।
“घर में और कौन – कौन है?” मैंने बाबा को और भी खुलने के लिए प्रयास करने लगा ताकि उनके अंदर की तकलीफ और विवशता बातचीत करते हुए थोड़ी काम हो जाय।
” घर में तो अब मैं , मेरी बुढ़िया और एक सात – आठ साल की पोती ही बचे हैं। ”
” क्या बेटे – बेटी या और कोई परिवार ,” मैंने थोड़ा बातों को विस्तार देने के लिए पूछा था।
” हाँ , बाबू एक बेटा था। चार साल पहले कारखाने में ठेका मज़दूर में काम कर रहा था। दुर्घटना हो गयी। अस्पताल ले जाते – जाते उसकी मौत हो गयी। ” बाबा के गाल पर ढुलके आंसू मझे साफ़ नजर आ गए थे। वे कहे जा रहे थे , ” उसी साल इसी दुःख में उसकी जोरू भी चल बसी।“
मैं चुपचाप कार चलाये जा रहा था। अपने को दुःख भरा एक प्रसंग छेड़ने के लिए दुखी भी महसूस कर रहा था और कोस भी रहा था।
बूढ़े बाबा किसी भाव में डूबे हुए बोले जा रहे थे, ” उसकी पत्नी के मरने के बाद बेटी को पलने का जिम्मा हम बूढ़े – बूढ़ी पर आ गया। बेटी बहुत तेज है पढने में। दुर्घटना में मर जाने के बाद ठेकेदार और कंपनी ने जो रुपये दिए हैं उसे जमा करवा दिए हैं बैंक में। इससे उसकी पढ़ाई का खर्च निकल जा रहा है। ”

फिर बाबा चुप हो गए। उनके अंदर की वारिश और बाहर की वारिश दोनों में थोड़ा ठहराव जैसा लग रहा था। क्लीनिक नजदीक आ गया था। मैंने वहीं पर गाड़ी रोकी। बाबा के साथ जाकर काउंटर पर दवा ली। सारी दवाईयां और डाक्टर का लिखा पुर्जा एक गुलाबी रंग की पॉलिथीन की थैली में डालकर बाबा के साथ आकर गाड़ी में बैठ गया।
“चलो बाबा मैं भी ‘नीहारिका’ टावर कैंपस के तरफ ही जा रहा हूँ। आगे तक छोड़ देता हूँ।”
“तुम्हारा बहुत – बहुत धन्यवाद बाबू । आप इस बरसात में अपने कार से लेकर यहाँ नहीं लाते तो दवा नहीं मिलती। और अगर दवा नहीं मिलती तो मेरी पोती नहीं बच पाती। आप तो आज भगवान की तरह मुझे मिल गए। . ”
” बाबा बिलकुल ठीक हो जाएगी , आप निश्चिंत हो जाईये , बहादुर बच्ची है। ठीक हो जाएगी। ” मैंने उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए कहा था।
वारिश की रफ़्तार थोड़ी कम होने के कारण मैं गाड़ी तेजी से चला रहा था। निहारिका टावर से एक मोड़ पहले मैंने कार रोक दी। यहाँ से मुड़कर मैं अपने घर की और जल्दी पहुँचाना चाह रहा था।
“बाबा, यहाँ से तो चले जाओगे न।”
“हाँ बाबू यहाँ से तो बिलकुल नजदीक है, अब मेरी पोती को कुछ नहीं होगा। वह बच जायेगी।”
बाबा के आँखों में विस्वास देखकर मुझे भी उनके उतर कर जाने के अनुरोध को बेमन से ही स्वीकार करना पड़ा।
” बाबा, सुबह मैं आऊंगा पूछने कि बिटिया कैसी है ?
“बाबू मैं मोड़पर वाली चाय की दूकान पर ही सुबह मिल जाऊंगा। वहीं मैं आपको खबर दे दूंगा।”
बाबा आगे बढ़ गए। तब मैं अपनी कार मोड़कर घर की ओर चल दिया था।
घर पर पहुँच कर जब मुझे चाय पीने के बाद भी अच्छा नहीं लगा तो मैं कार लेकर फिर उसी जगह पर पंहुचा जहाँ मैंने बाबा को छोड़ा था। रात के करीब साढ़े दस बज रहे थे सड़क सुनसान थी। मैंने कार जैसे ही आगे बढ़ायी कार के हेडलाइट की रोशनी में एक पिंक कलर का पॉलिथीन गिरा हुआ दिखाई दिया। मेरा मन अनिष्ट आशंका से काँप उठा। कार की हेडलाइट मैंने ऑन कर रखी थी। कार वहीं रोककर पैदल आगे बढ़ा तो सामने गटर का ढक्कन खुला था। गटर के बगल में एक चप्पल पडी थी। और सामने वही पिंक कलर का पॉलिथीन पड़ा था जिसमें अभी – अभी बाबा के साथ जाकर मैंने दवाईयां दिलवायी थी।
मैंने कांपते हाथों से पालीथीन उठाया था और बाबा के बताये हुए बस्ती की गली में उनके मकान को याद करने लगा। जल्दी से गाड़ी स्टार्ट की और गली के मोड़ पर टीम – टीम लाइट की गुमटी की और बढ़ कर बाबा, पूर्णो बाबा हाँ, यही नाम था उनका, मकान पूछा था।
“यहाँ से तीसरा मकान जो खपड़ैल का है, वही है उनका मकान, अभी तो थोड़ी देर पहले दवा लाने निकले हैं, लगता है लौटे भी नहीं हैं।”
बस्ती में हर आदमी को हर आदमी की खबर होती है, खासकर जब कोई बच्चा या बच्ची बीमार हो तो अवश्य होती है।
मैंने तीसरे खपड़ैल के मकान में कुण्डी खटखटाई। दरवाजा एक वृद्धा ने खोला था। अपने कांपते हांथों से “दवाई है ” कहकर दवा देते ही जल्दी से वहां से लौट गया, अपने को लगभग बचाते हुए ताकि कोई यह न पूछ दे कि बाबा कहाँ रह गए? इस सवाल का मैं क्या जवाब देता?
मैं घर पहुंच कर रात में सोते हुए भी जागते रहा। लोकल न्यूज़ चैनल में खबर आ रही थी कि सुरेखा नदी में जलस्तर बढ़ जाने के कारण नदी के किनारे के रिहायसी क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गयी है। नदी का जलस्तर स्लूस गेट से ऊपर आ जाने के कारण इसे बंद कर दिया गया है। स्लूस गेट बंद किये जाने से शहर के नाले का पानी भी नहीं निकल रहा है…… इसीलिये शहर के निचले इलाके में भी जल जमाव बढ़ गया है।
दूसरे दिन शाम को खबर आई की जलस्तर कम हो रहा है और बाढ़ का खतरा टल गया है। इसमें वारिश के थम जाने से अधिक प्रशासन की मुस्तैदी का हाथ है।
तीसरे दिन सुबह के अखबार के तीसरे पन्ने पर जिसमें शहर की सारी अमुख्य और महत्वहीन खबरे होती हैं …… लिखा था,” निचले इलाके में नाले के मुहाने पर वाले स्लूस गेट के खोलने पर एक सड़ी हुयी लाश मिली है। लगता है दो दिन पहले नीचे के इलाके में पानी घुसने के कारण यह मौत हुयी होगी।“
यह खबर फिर कहीं दब गयी कि खुला हुआ गटर एक और जान लील गया।
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Lights,Camera and Action!!!

Circus-new-action


रंग-बिरंगे कपड़ों और जगमगाती रोशनियों के बीच तक़रीबन १० लोगों का एक शांत और गहनतम जमावड़ा लगा था | कदाचित,किसी गंभीर समस्या पर चर्चा हो रहा थी …
“आज भी बच्चों को भूखा ही सुला दिया..”..

“तुम सही कह रही हो बहेन और ऊपर से अब तो भूख के मारे उनकी आँखों से निकलने वाले आसूँ भी सूख गए हैं ! अजी सुनते हो,”आखिर कब तक हम युही घुट-घुटकर जीते रहेंगे! क्या इसका कोई उपाय नहीं?”
अब तुम्ही बताओ सरला क्या करूँ मैं! दुनिया वाले कहते हैं मेहनत का फल अवश्य ही मिलता है तो हम तो पिछले १० वर्षों से अपनी जान जोखिम में डालकर मेहनत कर रहे हैं पर शायद यह कहावत हम गरीबों के लिए बनी ही नहीं है | क्या कहते हो राजेश,कुछ सुझा?
दिन रात यही सोचता रहता हूँ महेश! कुछ नए करतब भी सिख लिए पर लगता है जो सर्कस पहले खिलखिलाते लोगों से सजा होता था आज वहाँ सिर्फ खाली कुर्सियाँ ही नज़र आती हैं!
और राहुल तुम तो हम सबसे अधिक पढ़े लिखे हो कोई नौकरी क्यूँ नहीं कर लेते?
गया था भैया और नौकरी मिली भी थी ,पर वो लोग कहते हैं १८ घंटे काम करो और यह सर्कस का धंधा छोड़ दो! अब आप ही बताओ भैया,५वीं कक्षा में जब माँ-बाप मर गए थे तब इस सर्कस ने ही तो हाथ थामा था,ये ज़िंदगी है मेरी,कैसे छोड़ देता!
एजी,पर लोग क्यूँ नहीं आते हमारा सर्कस देखने,इसमें मनोरंजन भी है और बच्चों को तो सबसे ज्यादा ख़ुशी देता है!
अरे विमला,तुमने दुनिया नहीं देखी इसलिए ऐसा कह रही हो,आजकल मनोरंजन के लिए माँ-बाप अपने बच्चों को टी.वी.,कंप्यूटर,कीमती खिलोने,मोबाइल इत्यादि खरीद देते हैं जिससे घर पर उनके बच्चों का मन बहेल जाता है..इसलिए आज हमें याद करने वाला कोई बचा ही नहीं | और यह पिंटू कहाँ रह गया,९ बज गए उसका कोई ठिकाना ही नहीं है?
पता नहीं जी,कहकर तो गया था कि अभी थोड़ी देर में आता हूँ माँ,आप जाकर देखिये ना मुझे तो घबराहट हो रही है अब |
हाँ तुम चिंता मत करो मैं जाकर देखता हूँ..
इतने में ही दूर से एक बच्चे की आवाज़ सुनाई दी..पापा…पापा..! अरे पिंटू! कहाँ था तू?
पर पिंटू इतना उत्साहित था कि उसे अपने पापा की आवाज़ ही नहीं सुनी | उसका ध्यान तो पीछे आ रही एक महिला पर था|कहने लगा,”ओ मैडम! यहाँ..यहाँ..मेरे पापा यहाँ हैं |”
और फिर कुछी समय में उस चर्चा में एक और आवाज़ जुड़ गई |” जी नमस्ते,क्या ये आपका बेटा है?”
राहुल ने बड़ी ही धीमी सी आवाज़ में कहा,”जी हाँ मैडम,पर आप..आप…आप तो अमीर लगती हैं..आप यहाँ..यहाँ कैसे?”
“जी,मैं एक डायरेक्टर हूँ..वो हुआ कुछ ऐसा कि मैं आपके सर्कस के पास जो स्टूडियो है,वहाँ से शूटिंग ख़तम करके निकल ही रही थी कि स्टूडियो के बहार रखे कूड़ेदान से कुछ आवाज़ आ रही थी |मैंने पास जाकर देखा तो ये बच्चा उस कूड़े को खा रहा था | मेरा दिल पिघल गया और मैंने आपके बेटे से कहा कि चलो बेटा,मैं आपको कहीं खाना खिला देती हूँ | आशचर्य तो मुझे तब हुआ जब आपके बेटे ने बड़ी घबराई हुई आवाज़ में मुझसे कहा कि मैडम,मैं तो खा लूँगा पर सर्कस के बाकी सब लोग तो आज भी भूखे ही सो जायेंगे ना इसलिए मैं नहीं खा सकता | एक भूखे बच्चे का इतना साफ़ मन देखके
मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई इसलिए मैंने उससे आपके सर्कस की सारी परेशानियाँ सुन ली और उनका हल निकालने की ठान ली | और मुझे लगता है मेरे पास आपकी इस समस्या का हल है |”

उनके ऐसा कहते ही अब तक उदासी भरे उस जमावड़े में मानो आशा की एक किरण लौट आई! पिंटू बोल उठा,”माँ,तुम ना कहती थी सब कुछ ठीक करने के लिए भगवान एक परी भेजेंगे,क्या ये वही है?”
विमला की आँखों में ख़ुशी के मारे आसूँ आ गए और उसने कहा,”हाँ पिंटू हाँ,ये परी ही हैं! ” पूरे सर्कस का माहोल ऐसा हो गया था मनो वर्षों के अकाल के बाद,काले बादल छा गए हों!
आप लोग कृपा करके मुझे परी या मैडम ना कहें,मेरा नाम नताशा है | और मैं तो सिर्फ सानियत का फ़र्ज़ अदा कर रही हूँ | आप लोग प्रतिभाशाली होते हुए भी पेट भरके खाने के लिए तरस रहे हैं और बहार दुनिया में ऐसे कितने लोग हैं जो फरेबी,गुंडे और बदमाश है और चैन की ज़िंदगी जी रहे हैं | अपनी जान को खतरे में डालकर दूसरों का मनोरंजन करना,ऐसा सिर्फ आप सर्कस वाले ही कर सकते हो | मैं आपकी मदद करके आपको आगे लाके लोगों में ये संदेश फेलाना चाहती हूँ कि गरीब होना कोई अपराध नहीं है| अमीर अगर अपना थोडा सा समय निकलकर गरीब की मदद कर दे तो समस्त देश एक साथ प्रगति कर सकता है |
सब लोगों की आँखें चमत्कृत हो उठी| उन्होंने सोचा भी नहीं था कि अमीरों के दिल में भी उन जैसे गरीबों की जगह हो सकती है| राहुल ने फिर पूछा,”तो मैडम,आज से हम सब आपके हवाले| आप जैसा कहेंगी हम सब वैसा ही करेंगे| क्यूँ,भाइयों!”
सभी लोग एक साथ बोल पड़े,”हाँ मैडम!!”
और फिर जन्म हुआ सर्कस के नए अध्याय का..
नताशा ने तुरंत काम शुरू कर दिया| उसने पहले सर्कस के गिरते बिज़नस का गहनतम प्रशिक्षण किया| सर्कस की खामियों की सूचि तैयार की जिसमे कई सारी चीज़े थी जैसे पैसों की कमी,पब्लिसिटी की कमी,नयेपन की कमी..इत्यादि| और फिर अगले दिन से ही उसने काम शुरू कर दिया| सुबह-सुबह सबको इकट्ठा किया और फिर अपनी योजना सबको बताई| सबकी तरफ देखते हुए फिर उसने कहा,
“आपकी कला और करतब में कोई कमी नहीं है पर उसमे कुछ नयापन नहीं है इसलिए मैंने सोचा कि क्यूँ ना आपकी कला के माध्यम से हम एक मिनी-मूवी लोगों को दिखाएँ! एक ऐसी कहानी जिसमे हास्य भी हो और लोगों तक एक अच्छा संदेश भी पहुँचे! पहली कहानी तो मैंने सोच ली है..ये पहली कहानी आप लोगों के जीवन पर ही आधारित होगी जिससे लोग सर्कस को एक नए नज़रिए देखने लगेंगे!
तो सब लोग तैयार हो जाओ,हम आज से ही शुरू हो जायेंगे| आप में से कुछ लोग मेरे असिस्टंट के साथ शो की पब्लिसिटी के लिए जगह-जगह पोस्टर लगायेंगे और कुछ लोग स्वयं सड़कों पर लोगों को हमारे शो के बारे में बताएँगे| तो चलो,सब तैयार??”

राहुल ने कहा,”मैडम,हम आपके कृतज्ञ हैं,आपने हमें मेहनत करने की सही दिशा दिखा दी” और फिर सभी जोर से बोल उठे,”जी मैडम,तैयार!!”
फिर अगले १ महीने की कड़ी मेहनत के उपरांत उसी सुनसान सर्कस में अब कुर्सियां लोगों के लिए कम पड़ने लगी थी | और सर्कस के पुनर्जन्म का आरंभ नताशा ने किया-”स्वागत है,आप सभी का हमारी आज की पहली पेशकश में जिसका नाम है-जीना यहाँ,मरना यहाँ!…तो सब मेरे साथ बोलिए- लाइट्स,कैमरा एंड एक्शन!!”
बस उस दिन के बाद से सर्कस में कोई भी भूखा नहीं सोया और नताशा जैसे अन्य लोगों ने भी आगे आकर अपने गरीब साथियों की मदद करने का प्रयास प्रारंभ कर दिया| असल बात तो यही है कि अच्छाई हम सभी के अंदर है,ज़रुरत है तो सिर्फ एक प्रेरणा की जो हमारे अंदर की इंसानियत तो जगाकर हमें अपने से ज्यादा,देश के लिए जीना सीखा दे…!
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Udaan

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हवा तेज़ चल रही थी…. तेज़ हवा के झोंके के कारण, खिड़की कभी खुलती, कभी बंद हो रही थी, मानो गहरी नींद से कोई जगा रहा हो, और आँखें नींद से जाग रही हों, और कभी वापस सो जा रही  हो…मैं उठा और खिड़की को वापस नींद के हवाले कर दिया…
वैसे आपको बता दूँ  ये कोई मामूली खिड़की नहीं थी,  मेरे इकलोते कमरे के बाहर जो छोटी सी बालकनी थी, उसी से सटी यह खिड़की थी , जो धूप को कमरे के अन्दर लाती थी, ये  खिड़की बस खिड़की नहीं थी, ये अपने आप में घर थी….जी हाँ….खिड़की के नीचे रखे कबाड़ में कबूतरी ने दो बच्चे दिए थे.  जब भी मैं काम से घर वापस आता था, कबूतरी को उसी जगह यथावत पाता, मानो उसे किसी ने “statue” कह दिया हो… शाम होते-होते मैं और कबूतर घर वापस आ जाते.. रात में मैं कलम और पन्नो से बातें करने लगता और कबूतर, कबूतरी को दिन-भर का हाल सुना देता….कबूतर को शायद “insomnia” था. . आप लोगों को आश्चर्य होगा, पर मैं सच कह रहा हूँ, क्योंकि वो रात में काफी देर-देर तक गुटर-गू करता रहता था…
सवेरा होते ही कबूतरी सबसे पहले अपने अंडो पे नज़र दौडाती….उन दिनों जब भी घर के लिए कुछ सामान आता था, उसमें कबूतर के परिवार के लिए भी सामान ले आता था.  जब पहली बार मैं कबूतरी को चने दे रहा था, तो मुझे अपने पास आते देख, वो अपने पंख जोर-जोर से फडफडाने लगी… क्योंकि उस समय कबूतरी, कबूतरी नहीं एक माँ थी… इंसान हो या पशु-पक्षी,  माँ की भूमिका सब में एक जैसी होती है…अपने बच्चों के लिए विशालकाय और भयावह चीज़ से भी वो लड़ने का साहस रखती है… मेरे पास हथियार तो था नहीं इसलिए मैंने उस साहसी माँ के आगे चने डाल दिए… धीरे-धीरे वो भी इस दिनचर्या की आदी हो गई.. काम पे जाने के पहले कभी भुट्टे के दाने तो कभी चने उसके पास डाल देता… कबूतरी उसमें से कुछ दाने शाम के लिए बचा लेती थी,  और एक कुशल गृहणी की तरह अपने पति को काम से आने पर परोस देती…
एक दिन सुबह-सुबह काम पे निकलना था,  बैग में जो-जो सामान बेचने door to door जाना था, वो रखा … कबूतरी को दाना दिया और एक घर के दरवाज़े पे खड़ा हो गया, और door बैल बजा दी.  रविवार का दिन था, और आज आशा थी, सामान ज्यादा बिकेगा…क्योंकि अधिकतर लोग आज घर पे ही मिलते हैं…एक लड़की ने दरवाज़ा खोला.. जैसे ही मेरी नज़र उसकी आँखों पर पड़ी, मुझे लगा इन आँखों को मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ… मैं इसी सोच-विचार में था,   कि लड़की ने पुछा-
“जी, बोलिए?”
” गैस लाइटर, आलू छिलना कुछ लेंगी आप ?”-  अपने विचारों से बाहर आते हुए मैंने कहा…
“आपको फ्यूज ठीक करते आता है”
“जी…?”
“नहीं वो क्या है…आज सन्डे है कोई इलेक्ट्रीशियन आ नहीं रहा है,  पूरे घर की बत्ती चली गई है…मेरी friend अपने काम पे गई है…..और मुझे फ्यूज ठीक करना आता नहीं है, बस इसीलिए… तो क्या आप? –  उस लड़की ने बड़ी मासूमियत से मुझसे पुछा…
“अरे जी…जी कोई बात नहीं…”
‘ सच…प्लीज अन्दर आ जाइए..” – लड़की ख़ुशी से चहक उठी, और उसके आँखें एकदम से बड़ी हुई, तब मुझे ध्यान आया….मेरे घर में जो कबूतरी है, इसकी आँखें तो बिलकुल वैसी है..
मैं कमरे में चला गया… कमरा ज्यादा  ज्यादा व्यवस्थित नहीं था, सामान इधर-उधर बिखरा पड़ा था.
“टेस्टर होगा आपके पास ?”- मैंने पूछा
“हाँ,  अभी देती हूँ…”
लड़की अन्दर कमरे से टेस्टर लेके आई और किचन में जाके चाय बनाने लगी.. मैंने वापस तार छीला और उसे जोड़ के जैसे ही प्लग लगाया कमरा रौशनी से जगमगा उठा.  किचन का पंखा भी चलने लगा, लड़की ख़ुशी से शोर मचाने लगी…
“मुझे लगा था, आज सारा दिन बिना लाइट की गुजारना पड़ेगा, thank you so much”- लड़की ने चाय मुझे देते हुए कहा…
मैंने बैग में से किचन के सामान निकाले और टेबल पर रख दिए…
“आपको किचन के लिए कोई सामान चाहिए तो आप देख लीजिये…”- मैं कबूतरी के आगे दाना डाल रहा था, की शायद कुछ खरीद ले….पहले तो कबूतरी ने ऐसा चेहरा बनाया, मानो टेबल पर रखी किसी चीज़ में उसे दिलचस्पी ना हो, लेकिन आखिर कबूतरी ने दाना चुगा… और आलू, प्याज रखने का रैक, चम्मचों का सेट और किचन में काम आने वाले छुरी, काटों का सेट मुझसे खरीद लिया…
“आप ये मत समझिएगा कि आपने फ्यूज ठीक किया है, इसलिए मैं ये सब ले रही हूँ..” लड़की ने मुस्कुरा कहा…
लड़की बातूनी थी, उसके १० वाक्य के बीच मेरा बस एक वाक्य हो पाता..लेकिन जिस सादगी से वो बात कर रही थी, वो मुझे बहुत अच्छा लगा… उसे ये जानकार आश्चर्य हुआ कि मैं ग्रेजुएशन पास करने के बाद  भी ये door to door कंपनी में काम कर रहा हूँ…. मुझे आश्चर्य था, एक अनजान व्यक्ति से लड़की इतनी बातें कैसे कर लेती है..
“असल में मैं रंगमंच करता हूँ, अभिनेता हूँ… ये नौकरी मैंने खुद चुनी है, क्या है दिन भर में अलग-अलग लोगों से मिलता हूँ,  अलग-अलग बोलने का ढंग…बस सब कुछ समेट के अपने अभिनय मेंन डाल देता हूँ….और ये बेच के पैसे भी मिल जाते हैं.”
” क्या…अरे वाह..” –  लड़की का मेरे प्रति दृष्टिकोण बदल गया, अब वो मुझमें कलाकार तलाश रही थी…जहाँ थोड़ी देर पहले उसके १० वाक्य के बीच मेरा एक वाक्य हो रहा था, अब वो वाक्य का अनुपात २०/१ हो चुका था, मैं लगभग मूक दर्शक था.. और मेरे सामने सवालों की बौछार थी.  इन जवाब और सवाल के बीच काफी समय निकल गया.  जो छुरी का सेट मैंने उसे बेचा था, उसी से आलू, प्याज, टमाटर काटकर आलू की सब्जी बनाकर उसने मेरे सामने रख दी. मंच पर जाने कितने किरदार मैंने निभाये होंगे. कल्पना और यथार्थ की ना जाने कितनी उड़ान भरी होगी…
जैसे ही उस लड़की ने रोटी परोसी…मेरे लिए पूरा वातावरण कल्पनामय हो गया…वो लड़की मेरे लिए मेरे घर की खिड़की पे बैठी कबूतरी हो गई,  कैसे वो अपने कबूतर के लिए दाने बचा लेती है….और उसके घर आते ही परोस देती है… मैं कबूतर बन चुका था…पंख लगाए कल्पना की उड़ान उड़ रहा था.  अब रोज़ सवेरे मैं दाने की तलाश में उड़ जाया करूँगा, और वापस लौटकर दिन भर का हाल अपनी कबूतरी को सुनाऊंगा, कबूतरी एकटक मुझे देखेगी…रात में मैं insomnia होने के कारण… गुटर गू करूँगा…और कबूतरी मुझे कहेगी…
“श श श…धीमे बात करो… बच्चे सो रहे हैं…”
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My Sweet Home..

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पटाखों के शोर-गुल में घर के अन्दर पूजा-अर्चना चल रही थी… इस घर को पैदा हुए आज पूरे ७ साल हो गए… दिवाली के चार-दिन पहले ये घर हमारी दुनिया में आया.. और इन ७ सालों में इस घर ने हम सब सदस्यों को अपने में समेट लिया.  वैसे तो काफी समय से इसे अपने पास लाने की इच्छा थी, लेकिन स्थिति बिलकुल अलग थी… इस शहर में खुद के पाँव पर खड़े रहने में ही समय लग जाता है…इस प्यारी सी चीज़ को कैसे सहेज कर रखते…बाप-दादा ने सारी जिंदगी इसको पाने के लिए लगा दी.  इसलिए इन सात सालों में इस घर के एक एक कोने को मेरी माँ ने अपने हाथों से सजाया था. चिंटू सबसे बड़ा उत्साही कार्यकर्ता था, जो माँ के कामों में हाथ बटा रहा था.
मेरे लिए इस घर की सबसे आकर्षक जगह थी, इसकी छत… इतनी जगह किराए से रह चुका था…हर बार छत मकान मालिक की होती. मेरे लिए घर से ज्यादा उसकी छत थी, जो मुझे सपनो में आती थी.  छत में सुबह-सुबह कुर्सी लगा के,  बीवी के हाथों की चाय पीना…वाह…
बचपन में मुझे मेरे दोस्त राकू बुलाते थे…जो अब राकेश हो चूका है… दिवाली के दिन सारे बच्चे पटाखे फोड़ते…हर चेहरा दिवाली की रौशनी में चमक रहा था, पर मैं चुप-चाप एक कोने में बैठा था.  तभी पापा ने मुझे चुपचाप एक कोने में बैठे देखा….वो मेरे पास आये….और मुझसे ऐसे बैठने का कारण पुछा…उन्हें जानकार आश्चर्य भी हुआ, और कोतुहल भी…कि मैं  दिवाली में बम नहीं फोड़ना चाहता था. मुझे  बस एक फुलझड़ी जलानी थी और वो उसे कोई दे नहीं रहा था. उन्होंने मेरी छोटी बहन  पिंकी के पटाखों में से फुलझड़ी का एक पैकेट निकाला और मुझे  दे दिया..
“इतनी सारी नहीं…बस दो बहुत हैं…” – मैंने  ने पैकेट से दो फुलझड़ियाँ निकाल कर कहा.
“क्यों पटाखे तुम्हें अच्छे नहीं लगते ?”- पापा ने  कौतुहल दूर करने के लिए मुझसे ये सवाल पूछा.
“बहुत ज्यादा नहीं…आप कहते हो,ना  ये पैसे की बर्बादी है… इतने पैसे खर्च करके हम लोग  जला देते हैं, और बदले में क्या मिलता है..”शोर और धुँआ. इसलिए मुझे पटाखे नहीं चाहिए आप वो मेरी पॉकेट मनी में जमा कर दो “- मैंने पापा को कहा…
“अच्छा और फिर उन पैसों का क्या करोगे?”- पापा ने पूछा.
“मैं ना…उन पैसों से ईंटें खरीदूंगा….और जब ढेर  सारी ईंटें हो जाएँगी.. तो उन सबको जोड़ के,  हम सब के लिए घर बनाऊंगा…”
पापा मुझे एकटक देखते रहे…वो  राकू की अन्दर छिपे राकेश को तलाश रहे थे….
“राकेश बेटा, प्रसाद….”
पूजा समाप्त हो चुकी थी…पापा प्रसाद लिए खड़े थे… मैंने पापा के पैर छुए….प्रसाद की थाली में प्रसाद के बगल में फुलझड़ी थी…पापा ने मेरे हाथ में फुलझड़ी दी और कहा-
“Happy Diwaali, राकू बेटा”-
मैंने पापा के हाथ से फुलझड़ी ली और छत की ओर दौड़ लगा दी…
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Curfew..

dry-flower-curfew


राम चन्दर के  छोटे से परिवार में उसकी पत्नी सुशीला, दो बेटे और एक बेटी है I राम चन्दर  दर्जी की दुकान से सिलाई के लिए कपड़े लाता है तथा  सिलकर वापस कर देता है और जो पैसे हाथ में आतें हैं उनसे घर का और बच्चों की पढाई का खर्चा जैसे तैसे निकल ही जाता है I बावजूद इसके कि सुशीला भी कुछ ना कुछ काम करके घर के खर्चे में हाथ बटाने का पूरा प्रयास करती  है  लेकिन रोज कुआँ खोदना और रोज पानी पीने वाली कहावत काफी  हद तक राम चन्दर के परिवार पर ठीक बैठती है I
दो चार दिन से  शहर के हालात कुछ अच्छे नहीं थे I  शहर  का वातावरण काफी तनाव पूर्ण था I चारों ओर अफवाहों का बाज़ार गरम था I शहर के दो मुख्य समुदायों के बीच अविश्वास का जहर घुलता जा रहा था  I   चारों ओर अफवाहों का बाज़ार गरम था I  कभी किसी हिन्दू के मारे जाने की अफवाह आती तो  इसके कुछ देर बाद ही किसी मुसलमान के मारे जाने की अफवाह जोर पकड़ती लेकिन सत्य क्या है कोई भी बता पाने में असमर्थ था I   इस तरह की सारी अफवाहें   भी शहर  के   तनाव को   और ज्यादा   बढ़ाने  में अपना पूर्ण  योगदान दे  रही  थीं I   घर से बाहर  निकलने से पहले हर व्यक्ति दो बार सोचता और यदि बाहर निकलना अति  आवश्यक ही होता तभी घर से  बाहर  निकलता  तथा साथ ही  घर जल्दी से जल्दी  लौटने  का भरसक प्रयत्न  करता I
शहर में पुलिस की गश्त बढ़ने के साथ -२ दफा १४४ लगा दी गयी थी I लोग गलियों के मुहाने पर छोटे -२ समूहों में खड़े होकर शहर के हालात पर अपनी -२  राय व्यक्त कर रहे थे I  कुछ लोग   दूसरे समुदाय के लोगों पर आरोप लगा -२ कर अपना आक्रोश  प्रकट कर रहे थे तो कुछ लोग उनकी हाँ में हाँ मिला रहे थे लेकिन जैसे ही वें  दूर से पुलिस की गश्ती टीम को देखते तो तुरन्त अपने घरों में जा घुसते और इनमें सबसे आगे वही होते थे जो सबसे ज्यादा आक्रोशित थे I
शाम शनैः -२  अपने पंख फैला रही थी I  शहर के खराब हालात  के  कारण शाम होते -२   सड़कों पर आवाजाही काफी कम हो गयी थी I     लोग  किसी अनहोनी की आशंका  से डरकर  अपने -२ घरों में दुबक गए थे  I  सड़कों पर अधिकतर  वही लोग बचे थे जिनकी नियति में शायद रोज कमाना  और रोज़ खाना ही लिखा था जैसे सब्जी बेचने वाले , रिक्शा वाले , तांगे वाले , इत्यादि I  दुकानें  भी समय से पहले ही बंद होने लगी थी I
सुशीला ने शहर के हालात  देख कर राम चन्दर को सिले कपड़े वापस करने के लिए यह कहकर रोक लिया कि कल दिन में चले जाना I
गली के अन्दर भी इक्का  दुक्का  दुकान  ही खुली थी I  सामने हलवाई की दुकान पर  जमा ९-१०   लोग   आपस में बातें करने में व्यस्त थे  और शायद बातों का मुद्दा शहर के हालात ही रहा होगा  I तभी गली में शोर हुआ और एक पुलिस जीप हलवाई की दुकान के सामने आ कर रुकी , उसमें से ६-७ पुलिस वाले उतरें  तथा   हलवाई की दुकान पर जमा हुए लोगों में से दो को अपने साथ ले गए I राम चन्दर भी उस समय गली में ही मौजूद  था I
शोर सुनकर ,सुशीला ने चिल्ला कर बेटे से कहा ,
अरे कमल, देख तो  तेरे बापू कहाँ  पर है ? उन्हें जल्दी से ऊपर बुला कर ला I
कमल दौड़ कर जीना उतरने लगा , अभी आधा जीना ही  उतरा था कि उसने राम चन्दर को जीने से ऊपर आते देखा I
अन्दर आकर राम चन्दर  ने बताया कि  शहर में दंगा भड़क गया है और पुलिस दंगा भड़काने वालों को गिरफ्तार कर रही है I  अभी उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि बाहर  से लाउडस्पीकर पर घोषणा सुनाई पड़ी कि सारे शहर में  अनिश्चित कालीन कर्फ्यू लगा दिया गया है I सभी स्कूल , कॉलेज व दफ्तर इत्यादि   अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिए गए  हैं  I
सर्दी की रात  थी इसलिए ९-१० बजे सड़को पर आवाजाही वैसे ही थोडा कम हो जाती है लेकिन कर्फ्यू  की घोषणा के कुछ देर बाद ही   सड़कें भायं-२  करने लगी  I  चारों  ओर एक मनहूस सी नीरवता फ़ैल गयी   थी I  सड़कों  पर गायों और कुत्तों का जैसे साम्राज्य  सा हो गया था I गायें ५-७ के झुंडों  में सड़क के बीचो बीच बैठ कर जुगाली करने में व्यस्त थीं  तो  कुत्तें भी  छोटे -२ समूहों में सड़क पर कुलाचें भर कर सुनसान पड़ी सड़कों का भरपूर  आनंद ले रहे थे I रात भर दूर से  हर -२ महादेव और अल्लाह  हो अकबर के नारों की आवाजें  गूंजती रही I
भोर सहमते -२ अपने पाँव बढ़ा रही   थी  I   सूर्य की  किरणें कोहरे की घनी चादर को भेदने का असफल सा प्रयास कर रही थी, I पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ भी नहीं आ रही थी , लगता था जैसे उन्होंने भी  कर्फ्यू के डर से मौन व्रत  धारण कर लिया  है  I   वीरान पड़ी सड़कों पर फैला सन्नाटा दिल में एक अजीब सा खौफ पैदा कर रहा था  I वातावरण में अजीब सी असहजता घुल कर उसे और बोझिल  बना रही थी ,
सुशीला ने बच्चों को चाय नाश्ता कराकर पढ़ने के लिए बैठा दिया I एक प्याला चाय का राम चन्दर  को देकर और बची खुची  चाय एक गिलास में ले पास ही बैठ कर  पीने  लगी I
उसे शांत देख कर  राम चन्दर ने उससे पूछा :
“क्या बात है , कुछ  परेशानी  है  क्या ” ?
सुशीला  ने कुछ जवाब नहीं दिया और चुप चाप चाय पीती रही I
चाय पीकर सुशीला वहां से उठकर   रात के  झूठे पड़े बर्तनों को साफ़ करने लगी I
हर समय कुछ ना कुछ बोलने वाली सुशीला की चुप्पी राम चन्दर के मन  को बैचन कर  रही थी   I  उसने उसके पास जाकर  फिर    पूछा :
“क्या बात है” ? “तू  कुछ बताती क्यों नहीं”  ?
“क्या बताऊँ , घर में आटा ख़त्म हो रहा है, कल शायद मुश्किल से ही निकल पाए ; पता नहीं यह मुआ  कर्फ्यू कब तक  चलेगा  ?”
मैंने तो तुझसे कल ही कहा था  ” सिले कपड़े देकर कुछ पैसे ले आता हूँ पर तूने ही रोक दिया” I
“लेकिन , मुझे क्या पता था कि कर्फ्यू लग जायेगा” I
“सुनो  ! बच्चों को कुछ मत बताना ” I
रात भर दोनों को नींद नहीं आई I आटे की किल्लत  के चलते सुशीला ने बच्चों को नाश्ते में कुछ भी नहीं दिया  और बच्चे भी शायद  मां के चेहरे पर घिरी चिंता को देख कर कुछ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए  I   कुछ तो गड़बड़ है, बच्चे इस बात का अनुमान मां-बाप के चिंता ग्रस्त चेहरों को देख कर लगा तो रहे थे लेकिन वास्तविक परेशानी क्या है इससे एकदम अनभिज्ञ थे I
अकसर बच्चे पढ़ते समय दोनों को शांत रहने के लिए कहते थे लेकिन आज उन दोनों की शांति उनकी पढाई में सहायक न हो कर उनकी दिन में   बात करने की आवाजों  से कहीं ज्यादा व्यवधान पैदा कर रही थी I
दोपहर के भोजन में सुशीला ने बच्चों  को  दो -२ रोटी , प्याज के छोटे से टुकड़े और नमक के साथ परोस दी I राम चन्दर ने खाने से मना कर दिया लेकिन सुशीला ने जिद कर के उसे कुछ खाने को मजबूर किया तो बड़ी मुश्किल से एक रोटी खाकर उठ गया I बच्चों और पति को भूखा देख उसके गले से एक कौर भी नीचे नहीं उतरा I एक गिलास पानी पीकर वह उठ गयी I  शाम को बच्चों के हिस्से में एक -२ रोटी ही आई I
सुशीला की गली में  किसी से उधार माँगने की हिम्मत भी नहीं पड़ रही थी क्योंकी गली में अधिकतर लोगों की  हालत   उसके   जैसे  ही थी  I
अगले दिन  बड़ी हिम्मत जुटाकर  सुशीला गली की दुकान वाले लाला से कुछ राशन उधार मांगने  के लिए उसकी  दुकान पर पहुँची I
“लाला , कुछ राशन उधार दे दो , घर में इस वक्त एक भी दाना नहीं है ,बच्चे कल शाम से भूखे है” I
“बहन , देखो मैंने भी  आज  दुकान  दो  दिन बाद खोली है , बिक्री भी कुछ ज्यादा नहीं हो रही है क्योंकि सभी तो तुम्हारी तरह उधार माँगने आ रहे है” I
वह लाला की मिन्नत करती  हुई बोली  ,“नहीं लाला, जैसे ही इन्हें  पैसे मिलेंगे मैं सबसे पहले तुम्हारे पैसे ही चुकाऊँगी” I
“सभी तो यही कह रहे है , अगर मैं सबको इस तरह उधार दे दूं तो मेरे बच्चे भी तो भूखे ही मर जाएंगे” I
लाला किसी भी प्रकार उधार राशन देने को तैयार नहीं हुआ I
सुशीला भारी मन से घर लौट आई  I  बच्चों और पति को भूखा देख कर उसकी आँखे पनीली हुई जा रही थी I  उसका मन बच्चों  को भूखा  देख कर बुक्का फाड़ कर रोने का हो रहा था  लेकिन बच्चों के सामने रो भी तो नहीं सकती थी I  वह चुपचाप रसोई में आकर धोती के पल्लू से मुंह दबाकर सुबक पड़ी I राम चन्दर रसोई के दरवाजे पर खड़ा चुपचाप उसे सुबकते हुए देख रहा था I
पड़ोस के रेडियो पर सभी शहरवासियों से शांति बनाये रखने की अपील का प्रसारण लगातार सुनाई पड़ रहा था  I
दोपहर हो गयी थी I बच्चे कल शाम से भूखे थे , कमल को और उससे छोटे वाले को तो सुशीला ने जैसे तैसे समझा लिया था लेकिन छुटकी खाने के लिए जिद पकडे हुए थी और अभी रोकर सोई थी I
सुशीला को उस नन्ही सी जान पर प्यार  आ रहा था I ममता से हुलसकर उसने ज्यों  ही  उसके गालों को अपनी उँगलियों से छूआ तो एकदम चौंक पड़ी , छुटकी के गाल एकदम आग जैसे तप रहे थे I उसने आवाज देकर राम चन्दर को बुलाया I वो बेचारा भी क्या करता I कहीं से ढूंढ कर एक ऐनासीन की गोली निकाल कर सुशीला को दी और दोनों छुटकी के जागने का इंतज़ार करने लगे I
शाम हो चली थी ,चारों और फैली नीरवता मन में एक  डर  सा पैदा कर रही थी I
अँगीठी भी एक कोने में असहाय सी पड़ी थी, आज  उसे  पूछने वाला कोई नहीं था I
छुटकी ने धीरे से आँखे खोल कर मां को पुकारा I सुशीला दौड़ कर उसके पास आई तथा उसका माथा छूकर उसका बुखार का अनुमान लगाया I उसे अभी भी तेज बुखार था I उसने पानी के साथ पास रखी ऐनासीन की टिकिया उसे खिला दी I दोनों बेटे भी छुटकी के  तेज बुखार के कारण अपनी भूख  भूल गए थे और उसके पास बैठ कर उसके हाथों को सहला  रहे थे I
तभी पड़ोसन ने अपनी छत से उसे पुकारा ,
“अरे सुशीला सुनती हो  ! अभी -२ रेडियो पर खबर आई है कि कल सुबह ७ बजे से शाम सात बजे तक कर्फ्यू में ढील दी जाएगी “
सुशीला की रात छुटकी के सिरहाने बैठे -२ ही कट गयी I  सुबह बुखार कल शाम से कुछ कम था I
उसने उठ कर घर में  झाडू बुहारी का कम निबटा और  नहा  धोकर आले में रखे भगवान के आगे दिया बाती करने की सोची , मन तो नहीं कर रहा था लेकिन सालों से पड़ी आदत से मजबूर थी सो भगवान  के  आगे दिया बाती कर दी  I
उसके मन में रह -२ कर विचार आता था  कि भगवान भी हम गरीबों की परीक्षा ही क्यों लेता है, किसी के पास तो इतना है कि खाने वाले  नहीं और किसी को एक -२ वक्त के खाने के लाले पड़े है I
छुटकी का  बुखार फिर से बढ़ गया था  I
कुछ सोच कर  उसने कमल  को अपने साथ बाज़ार चलने के लिए कहा I
“मां, हम कहा जा रहे है” ?
“ बेटा मैं सोच रही थी कि वह दुकानदार  जिसके पास से मैं हर महीने  राशन लाती हूँ शायद कुछ उधार दे दे” I
बाज़ार में सब और भीड़ ही भीड़ थी I हर  व्यक्ति  हड़बड़ी में था जैसे शैतान उसका पीछा कर रहा हो और  जल्द से जल्द घर लौटने  के लिए प्रयासरत  था I
दुकान पर पहुंच कर उसने दुकानदार से कहा , “ भय्या , घर में राशन खत्म  हो गया है, बच्चे दो दिन से भूखे है , कर्फ्यू की वजह से घरवाला भी काम पर नहीं जा पाया , कुछ राशन उधार दे दो , मरद को पैसे मिलते ही तुम्हारे पैसे चुका दूंगी “ I
“बहन देखो, मैंने कई दिन बाद आज दुकान खोली है , सुबह से अभी तक बोहनी भी नहीं हुई है , अब तुम ही बताओ कि ऐसे में उधार कैसे दे दूं ” ,
“मैं तुम्हारी मजबूरी समझ सकता हूँ लेकिन तुम भी तो मेरी मजबूरी समझो “
सुशीला ने उसकी बहुत  मानमनौवल की पर  उसने राशन उधार देने से एकदम मना कर दिया
अब क्या करे क्या ना करे , इसी उधेड़बुन में वह कमल को साथ लिए घर लौट आई  I  सुशीला को समझ नहीं आ रहा था  कि वह   वर्तमान परिस्थिति से कैसे निबटे ? एक तरफ घर में भुखमरी तो दूसरी तरफ  बीमारी    ?
घर  लौटकर वह कुछ देर तक  गुमसुम सी बैठी रही ,फिर अचानक कुछ सोच  कर वह उठी और रसोई में चली गयी I कुछ देर तक वहाँ से खटर पटर की आवाजें आती रही I फिर शांति छा गयी I   बच्चों और राम चन्दर ने  सुशीला को   एक पीतल का बड़ा सा पतीला  हाथ में लेकर कमरे में आते देखा  I यह वही पतीला था जिसे वह पिछले  तीन  चार साल में   थोड़े -२ पैसे इक्कठे करने के पश्चात इन्ही गर्मियों में खरीद कर लाई थी ताकि  बच्चों को जाड़े के दिनों में पानी गरम कर नहाने में सुविधा हों, लेकिन घर की वर्तमान स्थिति के आगे इस सुविधा का क्या औचित्य ?
उसने कमल को साथ में बाज़ार चलने के लिए कहा I  पास के बाज़ार में बर्तनों की एक दुकान पर जो ऊपर वाले की दया से उस समय खुली हुई थी   उसने वह पतीला बेच दिया I हिसाब लगा कर दुकानदार ने कुछ पैसे  उसकी  ओर  बढ़ा दिए I
हाथ में  आये पैसों ने सुशीला की मुश्किल  कम करने  के बजाए और बढ़ा दी  I एक तरफ घर में भूखे बच्चे थे तो दूसरी तरफ बीमार छुटकी और हाथ में सिर्फ इतने पैसे कि उनसे एक ही काम हो सकता था  या तो घर में राशन लेकर जाये या छुटकी को डाक्टर को दिखा कर दवाई दिलाये  , दोनों ओर ही उसकी ममता का तकाज़ा था और ममता की इसी दुविधा से दो चार होते हुए  वह भारी क़दमों से कमल को  साथ लिए घर की तरफ  चल पडी  I
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Uban ka Cancer..

woman-hand-heart

अलका की नींद कुछ जल्दी ही खुल गयी ., या यूँ कहें कि उसे आज-कल नींद आती ही कहाँ ………?
िबस्तर से नीचे पैर रखने में ऐसा लगा कि…मानों मींलो का सफ़र करना हो ..ख़ैर ख़ुद को समेट वाॅशरूम गयी…अलका शीशे में देर तक स्वयं को निहारतीं रही ….स्वयं के लिये कोई अनुभूति ही नहीं …जैसे वह कोई सामान हो….िनर्जीव ,एक मशीन। उसने अपनी ज़िन्दगी स्वयं चुनी थी…अनुराग से पहली नज़र का प्यार….फिर परिवार की मर्ज़ी से शादी…जाॅब छोड़ने का निर्णय भी उसी का..वह अपनी माँ को दो पहियों में पिसते देख चुकी थी….उसके लिये जाॅब करना किसी स्त्री के अस्तित्व का परिचायक नहीं था।अ लका एक सुन्दर ख़ुशियाँे से भरा घर चाहती थी…और उसने जी भर के अपने सपने को पूरा किया…सास-ससुर साथ ही रहते……अलका उनकी लाड़ली …और उसके लिये वे माँ-पापा से भी बढ़कर..शादी के तुरन्त बाद आया घर का दीपक ….प्यारा सा कौतुक…।

सब बहुत अच्छा ….लेकिन कहतें हैं ना ज़िन्दगी बदलाव माँगती है….िवस्तार चाहती है और एक प्यास चाहती है़़ … अलका चाह कर भी प्यास,चाह ,बदलाव नहीं पैदा कर पा रही थी….उसके ख़ुशहाल जीवन में ऊबन के विषाणु अपनी जड़े फैलाते जा रहे थे और वह बिल्कुल बेबस….,कभी -कभी सोचती
कि पति-पत्नी के गहरे प्रेम के बीच ये ऊब कैसी…”कहीं उनके प्रेम में कोई खोट तो नहीं”।

इन दिनों वह प्रेम,रोमान्स,सेक्स,गृहस्थी सबको तराज़ू के एक पलड़े पर रखती और दूसरे पर इन सबके बीच िछपे ऊब के कीड़े को….दूसरा पलड़ा निर्दयी सा मुँह चिढ़ा रहा होता…वह अभी इन्हीं ख़्यालों में गुम थी कि कौतुक के रोने की आवाज़ आई…..उससे जा कर चिपट गई….वह उसे अपनी नन्ही -नन्हीं उँगलियाें से सहला रहा…उँगलियाँ कभी गाल को छूती ….कभी नाक ,कभी बालों को,कभी उसकी आँखों में उँगली घुसाने की नादान कोशिश करतीं…वह आँखें बंद कर सारा आनन्द अपने भीतर समेटने की कोशिश कर रही थी….इतना ज़रूरी काम था …मानों आज पानी की सप्लाई बंद रहेगी…और इसको जितना ,जहाँ हो सके भर लो….।
अनुराग कितना समझाते….प्यार से ,मनुहार से,उपदेश भी दे डालते ……”अलका ख़ुशियाँ बटोरो….आज में जियो”…..कभी हार कर कुछ उल्टा-सीधा बोल जाते….तब उन दोंनो के बीच एक गहरी उदासी फैल जाती। जिसका उपाय तो था बहुत ही सरल किन्तु हाथ से फिसल जाता……ज़िन्दगी बहुत सीधी सरल दिखती है और उसे समझने की कोशिश में लग जाओ तो…..भौतिक विज्ञान के किसी जटिल सूत्र की भाँति …पल्ले ही नहीं पड़ती बल्कि और उलझती जाती है।
अपने सारे प्रयासों के बीच फँसीं अलका टूट रही थी……..वही उबन,उदासी ……स्वयं को पकड़ने की कोशिश में स्वयं को फिसलते देखना…..।उसे मन करता कि वह भाग जाये कहीं…..दूर हिमालय पर ,मुम्बई के डिस्को -पब या बनारस की गुमनाम गलियों में स्वयं को खो दे…शायद स्वयं को पाना तब सम्भव हो जाये….अपने होने का मक़सद सामने था….लेकिन उसे देखना,छूना,अनुभूत करना असम्भव सा..।
अलका सबकी ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढ़ने वाली साधारण सी भारतीय नारी…आधुनिक होते हुये भी जिसकी सोच “सब ख़ुश रहें” पर सिमट जाती….िफर अब क्या हुआ?
यही सब सोचने पर घड़ी पर नज़र गई…..बहुत समय हो चला था….उसे जल्दी-जल्दी घर के काम िनपटाने हैं…..शायद उसकी यही “निपटाने वाली प्रवृति”उब बन कर उसकी आत्मा में घर बना रही है..।आज उसको अपनी कुछ सहेलियों के साथ लन्च पर जाना है….उसे समय पर पहुँचना है।
शायद उनकी कोई बात उसे निकाल ले इस मकडजाल …।

इति,साधना,रूपम,रचना सब पहले ही पहुँच चुकी ….दरवाज़े में घुसते ही उनके ठहाकों की आवाज़ कानों में उमंग घोलने लगी…….इस उमंग को अपने अन्दर समेटने में कितनी मेहनत करनी पड़ रही है….यह सोच अलका अपने पर ही मुस्कुरा दी……धत् !!!
“आओ अलका ! हम सुखी लोगों के बीच दुखी मीना कुमारी…….वैलकम !!”….अलका सुनकर खिसिया गई।
सब शादीशुदा बाल-बच्चे वाले…..बल्कि सबकी शादी को पाँच साल से ऊपर हो चला था…..बस रचना ही बैचलर लाइफ़ के मज़े ले रही थी….उसके पापा को चिन्ता नहीं और रचना जैसी स्वतन्त्र लड़की को यूँ ही कोई पसन्द आ जाये…यह आसान नहीं । वह ज़िन्दगी से भरी हुई लड़की थी……एक बैंक में पी.ओ थी…..व्यस्त रहती….िजन्दगी को घूँट -घूँट स्वयं में समा लेना कोई रचना से सीखे।र
चना उसे समझाती कि “अलका तुम जो जीवन जी रही हो…..वह बहुत ख़ूबसूरत है……तुम सृजनकर्ता हो….सुन्दर घर,स्वस्थ ,सुखी परिवार ….कौतुक में संस्कार रोपती तुम…..तुम्हारी ज़िन्दगी के अलग मायने हैं”
अलका अपनी इस ख़ूबी को अनुभूत करने की कोशिश में लग जाती।
साधना और रूपम अपने बच्चों को साथ लाई थीं…अकेले रहतीं थीं तो किसके पास छोड़ती ….इति मस्त थी….. वह अपनी माडर्न सास की आम सी बातों को तरह-तरह के मसाले लगा सुनाने लगी….सबका हँसते-हँसते बुरा हाल था….इतने दिनों के बाद इतना हँसने पर अलका की आँखों में आंसू छलक जा रहे थे। सामने वाली टेबल पर एक हाई-क्लास प्रोफ़ेशनल महिला बैठी थी…..जो लैपटॉप पर काम करते-करते बीच में उन्हें देखती,मुस्कुराती फिर अपने काम में लग जाती।शायद उसे भी इस चालू गाॅसिप में मज़ा आ रहा हो………वो भी तो औरत है छोटी खुिशयों को कैसे पकड़ा जाता है……बख़ूबी जानती होगी।
अलका भी जानती है लेकिन वह ऊब के ऐसे मकडजाल में फँसीं हुई है……..कि उसका निकलना मुश्किल होता जा रहा है। शाम के पाँच बज गये थे..अक्टूबर माह…..सूरज पुनः अपनी लाली बिखेर लौटने की तैयारी में…… और धरती सिहरती सी काला दुपट्टा ओढ़ने को आतुर……।सबने आईसक्रीम खाई,गले मिले,िफर मिलने का वादा किया।
अलका आॅटो-रिक्शा में बैठ मन ही मन संकल्प ले रही थी कि वह लडेगी इस उबन के ख़िलाफ़ …….अनुराग ,कौतुक सारे परिवार को उनकी ख़ुशियाँ लौटा…अपनी ख़ुशियाँे को जीत कर रहेगी।
घर आ गया था …छोटा सा ,फूल-पत्तियों से सज़ा ….हरा -भरा छोटा सा लाॅन ,सीलिंग से लटकतीं टेराकोटा की कन्दीलें……और इन सबमें झाँकती उसकी पहचान…..।अ न्दर घुसते ही माँ(सास) बिस्तर पर लेटी दिखीं….अनुराग कौतुक को गोद ले उदास से बैठे थे….मन किसी अन्जानी आशंका से डर उठा….अलका सिहर सी गयी…..अनुराग ने धीरे से बताया कि माँ की बायोप्सी रिपोर्ट आ गई है…..ब्रेस्ट में जो हल्की सी गाँठ थी …….कैंसर में बदल चुकी है…..हाँलाकि शुरुआती स्टेज में है तो इलाज सम्भव है।
अलका ने माँ का चेहरा देखा……उसका मन हुआ कि वह ज़ोर से उनको गले लगाये और यक़ीन दिलाये कि उन्हें कुछ नहीं होगा …इस लड़ाई में वह उनके साथ है….लेकिन एक अदृश्य दीवार सामने से रोक रही थी ,शायद सास -बहू के बीच की पारम्परिक दीवार…अलका ने स्वयं को समेटा और ज़ोर लगा दीवार तोड़ उनके गले लग गई…उनका हाथ पकड़ बिना रोये-िससके यक़ीं दिलाया कि वह पूरी तरह से उनके साथ है…..।
उसका यह क़दम उसकी सास के िलये जो भी मायने रखता हो….अलका की ज़िन्दगी में …िकसी रासायनिक द्रव्य की भाँति फैल रहा था…।अगले छः-सात महीने बहुत व्यस्त बीते….अलका ने अपना पूरा तन-मन अपनी सास की देखभाल में लगा दिया था….वो भी पूरे परिवार को भावनात्मक सुरक्षा देते हुये।उसकी सास अब पूरी तरह ठीक थीं…उनकी सारी रिपोर्ट नार्मल आई थी…….उनके ब्रेस्ट निकाले जा चुके थे।
अलका ने सहेली बन उनके स्त्रीत्व को बिखरने नहीं दिया…….वह स्वयं एक साहसी और समझदार महिला थीं ,उन्होंने स्वयं को सम्भाल लिया…और रही बात अलका की…उसके जीवन में फैला “उबन का कैंसर “बिलकुल समाप्त बल्कि उसे एक नई दृिष्ट,नई सोच और जीवन के प्रति एक नया रवैया दे गया..,.अब उसकी लड़ाई ख़त्म हो चुकी थी “ऊबन के कैंसर” के ख़िलाफ़ ….. तभी फ़ोन की घंटी बज उठी…रचना थी कुछ परेशान सी…
अलका समझाते हुये बोल रही थी”ज़िन्दगी हमें विस्तृत आकाश देती है और पंख भी,ढेर सारे रंग देती है और रंगने का हुनर भी और बदलें में हमसे उम्मीद करती है ….कि हम इस आकाश,पंख और रंगों का भरपूर सदुपयोग करे…।”
अलका की बातें सुन अनुराग मुस्करा दिये……..आख़िर इतनी छोटी मगर गहरी बात अलका को समझ आ ही गई…।
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Khwahishein..

icecream


सुबह के गयारह बज रहे थे आसमान बिलकुल साफ़ था धूप भी तेज़ निकली हुई थी बाज़ार लोगों से भरी पड़ी थी लोग अपने अपने काम में लगे हुए थ कोई स्कूल जा रहा था कोई कॉलेज कोई ऑफिस कोई सामान खरीद रहा था पूरी सड़क लोगों से भरी पड़ी थी आगे स्कूल कॉलेज ऑफिस सब कुछ होने की वजह से ये सड़क काफी बिजी रहता था!
सड़क के किनारे लाइन से लगे सब्जी फल मिठाई कपडे हर तरह की दुकान में लोगों की भीड़ लगी हुईं थी और सड़क के दूसरी तरफ दिनेश मोची अपना सामान बिछाये बैठा सड़क के दूसरी तरफ  सामने दुकानो में भरी भीड़ को देख रहा था और गुस्से हो रहा था कितने पैसे हो गएँ हैं लोगों के पास जब सौ दो सौ रूपये किलो में  लोग फल खरीद सकते हैं तो खाक मेरे पास अपने टूटे चप्पल जुडवाने आयेंगे नयी नहीं खरीद लेंगे!
दिनेश एक गरीब मोची था सुबह से शाम तक ग्राहक का इंतज़ार करता रहता था लेकिन उसके पास बहुत कम लोग ही आते थे ज्यादा तर स्कूल कॉलेज के बच्चे ही आते थे जिनके अचानक रास्ते में चप्पल टूट जाते थे और जिनके पास जुडवाने के इलावा और कोई चारा नहीं होता था !
ग़रीबी और अकेलेपन ने दिनेश को चिडचिडा कर दिया था वोह बिलकुल अकेला था बीवी बहुत पहले मर चुकी थी एक बेटी थी जिसकी शादी कर दी थी वोह बिलकुल अकेला हो गया था1 उसका बस एक बचपन का दोस्त था दोनों के घर करीब करीब थे शाम को अपनी दुकान समेटने के बाद दोनों घर के बाहर बैठे घंटो बातें करते रहते थे बस वही उसका एक सहारा था दिनेश का कभी मन  नहीं लगता तो उसका दोस्त उसके पास सो जाता कभी अगर तबियत ख़राब होती तो अपने दोस्त को बुला लेता!
दोपहर हो गयी थी वो अपना सामान बिछाये ग्राहक के इंतज़ार में बैठा सामने दुकानों में भरी भीड़ को देख कर गुस्से हो रहा था तभी सामने आइसक्रीम की दुकान से दो लड़के निकल कर सड़क के इस पार आकर उसके बगल में लगी बेंच पर बैठ गए और फिर बड़े आराम से एक पैकेट को खोला और फिर उसमें से एक बड़ी सी आइसक्रीम निकली थी जो देखने में बहुत  खुबसूरत थी  और फिर दोनों लड़के बड़े मज़े ले ले कर उसे खाने लगे वो कभी उसे चूसते कभी काटते और जब कटा तो अंदर से क्रीम निकल कर बहने लगा जिस पर  दोनों मज़े ले ले कर ज़बान फेरने लगे !दिनेश यूँ तो सामने देख रहा था लेकिन उसकी नज़र उन दोनों पे थी वो नज़रें तिरछी  किये उन दोनों को ही देख रहा था जिस अंदाज़ से वो मज़े ले ले कर खा रहे थे उसके मुंह में पानी आ रहा था! वो बार बार अपने को समझा कर नज़रें हटा रहा था पर उसका मन नहीं मान रहा था  वोह फिर नज़रें तिरछी  कर के उन्हें देखने लगता!
वोह रात भर सो नहीं पाया था पूरी रात वोह आइसक्रीम उसके नज़र में घूमती रही थी आइसक्रीम का खूबसूरत रंग उसके अंदर से निकलता क्रीम और लड़कों का उसे मज़े ले ले कर खाना पूरी रात उसके दिमाग में घूमता रहा!
अगली सुबह वो आइसक्रीम के दुकान पे था  उसे मालूम था की आइसक्रीम खाए बिना उसे चैन नहीं आएगा! पर  जब वोह दुकान से बाहर निकला तो उसके चेहरे पे उदासी थी वोह आइसक्रीम नब्बे रूपए की एक थी! वोह सोच कर के भी नहीं सोच सकता था की कोई आइसक्रीम इतनी महंगी हो सकती है वोह दस रूपए ले कर गया था जो उसके हिसाब से ज्यादा था!  दाम सुनने के बाद चुपचाप मुट्ठी में पैसे दबाये वापस आ गया!
वोह चुपचाप अपने दुकान पर आकर बैठ गया उसने सोच लिया था के यह  आइसक्रीम उसके बस की नहीं है नब्बे रूपए तो उसके कई दिन की कमाई थी नब्बे रूपए जमा करने में तो उसे कई दिन लग जाते!
आइसक्रीम थी के उसके दिमाग से   निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी बार बार उसके नज़रों के सामने इधर से उधर घूम रही थी! उसने खुद को समझाया छोड़ो आइसक्रीम को ये हमारे बस का नहीं है जितना हमारे पास है बस उसी में गुज़ारा करना है !
मैने पूरी ज़िन्दगी क्या किया है उसने खुद से सवाल किया! उसने ज़िन्दगी भर गुज़ारा किया था ज़िन्दगी भर बर्दाशत किया था कभी दोपहर के बचे खुचे से रात काम चलाया था और कभी रात के शोरबे को सुबह का नाश्ता  बनाया था! ज़िन्दगी भर मन को मारता  रहा था1 पर अब उसका मन नहीं मान रहा था! हालाँकि उसने हमेशा की तरह अपनी ख्वाहिस दबाने की कोशिश की खुद को समझाया की ये उसके बस का नहीं है लेकिन इस बार उसका दिल नहीं मान रहा था !
उसे बहुत चाय पीने  की आदत थी हर थोड़ी थोड़ी देर  में चाय पीता था! चाय पीने की एक और वज़ह थी के उसे भूक बहुत लगती थी और उसके पास इतने पैसे नहीं थे की वोह हर वक़्त कुछ कुछ खाता  रहे इस लिए चाय पी पी कर अपनी भूख दबाता रहता था !आज से  उसने चाय पीना कम कर दिया था !शाम को घर जाते वक़्त वोह रात का खाना ले कर जाता था अब उसने सालन लेना छोड़ दिया सिर्फ रोटी ले कर जाने लगा और उसे चाय चीनी गूढ़ किसे के साथ खा लेता था !ऐसे रोटी और चाय के पैसे बचाकर आइसक्रीम के लिए जमा करना शुरू किया !
कितने दिनों से उसके चारपाई  की एक टांग टूटी हुई थी वोह तीन टांग की हो गई थी! कब से  वोह   सोच रहा था की कुछ पैसे जमा हो तो इसकी मरम्मत करवाए! वोह एक साइड में सिमट कर सोता था कभी अगर नींद में गलती से करवट ले ली तोह वोह इतनी तेज़ी से टेढ़ी होती थी के वोह खुद को बचाते बचाते भी धडाम से ज़मीन पे गिरता था वोह कई बार गिर चूका था!लेकिन अब उसने  इसकी मरम्मत इरादा और थोड़े दिनों के लिए  टाल दिया था अब उसे सबसे पहले आइसक्रीम खानी थी !
अचानक शाम से उसके पेट में हल्का हल्का दर्द होने लगा था उसने जल्दी जल्दी दुकान समेटी और घर चला गया! रात होते होते दर्द काफी बढ़ गया था बड़ी मुश्किल से उसने बगल से हरी को बुलाया! वोह उसे डॉक्टर के पास चलने की जिद करता रहा लेकिन वोह डॉक्टर के पास नहीं गया बस दर्द की दो गोली मंगा कर खा ली! रात भर वोह दर्द से परेशान रहा सुबह होते होते दो तीन उल्टियाँ हुई तब थोडा दर्द कम हुआ !
असल में  दोपहर में उसने बहुत सरे केले और संतरे खा लिए थे उसने उसे सस्ते में ख़रीदा था जो थोड़े गले गले से थे! उसने सोचा था दोपहर का खाना खरीदने में ज्यादा पैसा लग जायेगा इस से ही  काम चला लें सो उसने खाने की जगह बहुत सारे  केले और संतरे खा लिए थे! और फिर शाम होते होते पेट में दर्द शुरू हो गया था! वोह डॉक्टर के पास इस लिए नहीं गया उसे मालूम था अगर वोह डॉक्टर  के पास जायेगा तो पता नहीं डॉक्टर दवाई इंजेक्शन क्या क्या बताएगा और फिर जो वोह एक एक रुपए बचा कर इतनी मुश्किल से पैसे  जमा किये हैं वोह सारे निकल जायेंगे ! इस लिए वोह रात भर करवटें बदल बदल कर दर्द को बर्दाश्त करता रहा !
आज वोह तीन दिन के बाद अपने काम पे आया था !पेट  दर्द इतने जोर का हुआ था की उसे कमजोरी हो गई थी घर पर ही आराम करता रहा! उसे जल्द से जल्द आइसक्रीम खाने का मन कर रहा था और पैसे थे की जमा होने का नाम ही नहीं ले रहे थे! और तीन दिन घर पर बैठने से जो पैसे जमा किये थे उसी से निकाल कर  खाना पड़ा  था और ग्राहक थे की आने का नाम ही नहीं लेते  थे! दोपहर हो गई थी लेकिन अभी तक किसी ग्राहक का पता नहीं था!
बहुत इंतज़ार के बाद शाम में एक आया उसे देख कर उसे बहुत ख़ुशी हुई उसने देखा अँधेरा हो रहा था अब शायद ही कोई और ग्राहक आए उसने सोच लिया था आज के खाने का खर्च इस ग्राहक से ही निकालना है! उसने उसके सैंडल  को हाँथ में ले कर उसे देखाने के लिए थोड़ी देर तक उलट पलट कर गौर से देखता रहा फिर बोला सैन्डल बहुत टूटी हुई है पहले इधर के फीते को उधर ले जा कर सीना पड़ेगा फिर उधर के फीते को इधर लाकर जोड़ना होगा फिर यहाँ से काट कर नया फीता लगाना होगा फिर ऊपर और नीचे  से चारों तरफ पूरी सिलाई करनी होगी पच्चीस रुपए लगेंगे! वोह इतना लम्बा चौड़ा भाषण दे कर आराम से बोला जैसे वोह बहुत कम पैसे बता रहा है और  इस पर एहसान कर रहा है वरना ऐसे टूटे सैंडल के तो और लग!ते
तुम तो ऐसे जोड़ और तोड़ बता रहे हो की यूँ लग रहा है तुम कोई चप्पल नहीं ताजमहल बनाओगे लाओ मुझे तुमसे नहीं सिलवाना! उस आदमी ने गुस्से से चप्पल उसके हाँथ से छीना और आगे बढ़ गया ! वोह उसे देखता रह गया एक इतनी मुश्किल से आया था वोह भी चला गया !
आज वोह दिन आ गया था जिस के लिए उसने कितनी मुसीबतें उठाई और कितना इन्तेज़ार किया आखिर उसने जैसे तैसे कर के पैसे जमा कर ही लिए थे !आज वोह आइसक्रीम खाने जा रजा था! अब इतनी महंगी चीज़ खानी थी तो उसके हिसाब से थोडा हुल्या भी अच्छा लगना चाहिए था !उसके लिए उसने कब से बक्से में पड़ी एक जोड़ी पेंट और शर्ट की  निकाली थी जो रखे रखे पुरानी हो चुकी थी लेकिन उसके लिए नई थी! बालों को ढंग से कंघा किया खुद को टूटे हुए आईने में घुमा फिरा कर देखा की वोह कैसा लग रहा है फिर वोह घर से निकला था !बड़ी शान से उसने दुकान से आइसक्रीम खरीदी थी !आइसक्रीम  को अपने हाँथ में देखकर उसे लग रहा था की उसका कितना बड़ा सपना पूरा हो गया है! उस से बर्दाशत नहीं हो रहा था मन कर रहा था बस यहीं पे खड़े खड़े खोले और खा जाए !लेकिन वोह इतनी महंगी चीज़ को अकेले में नहीं खाना चाहता था लोगों को दिखा कर खाना चाहता था !
वोह एक पार्क में गया वहां काफी लोग थे वोह आराम से एक बेंच पर बैठ गया और फिर स्टाइल से  आइसक्रीम के पैकेट को खोला था और फिर बच्चे जैसे खा रहे थे उसी स्टाइल में खाना शरू किया उस पे स्टाइल से धीरे धीरे ज़बान फेरने लगा! जैसे ही उसने आइसक्रीम को कटा उसका दिमाग घूमने  लगा  इतनी स्वादिस्ट चीज़ उसने आज तक अपनी पूरी ज़िन्दगी में नहीं खाई थी उसे लगा वोह हवा में घूम रहा है! मन कर रहा था बस एक सांस में ही सारी आइसक्रीम ख़त्म कर दे बर्दाशत नहीं हो रहा था ! लेकिन  सोचा  इतनी अच्छी चीज़ उसे अब दोबारा कभी नहीं मिलेगी तोह क्यूँ न मज़े ले ले कर जितनी देर तक हो सके खाते र!हें फिर आराम से धीरे धीरे ज़बान फेर कर आइसक्रीम के मज़े लेने लगा! जैसे ही उसने आइसक्रीम को दूसरी बार काटा  पता नहीं कैसे अचानक आइसक्रीम उसके हाँथ से छूट गई उसने तेज़ी से उसे पकड़ने की कोशिश की लेकिन पकड़ते पकड़ते बचाते बचाते भी वोह धडाम  से ज़मीन पर गिर गई! वोह बहुत तेज़ी से उसे उठाने के लिए झुका लेकिन उस से तेज़ी से सीधा हो गया जब उसे अगल बगल बैठे  लोगों का ख्याल आया !आइसक्रीम में रेत मिटटी लग गयी थी ज़मीं गरम थी वोह तेज़ी से पिघल रही थी
वोह बेबसी से आइसक्रीम को देख रहा था कितनी तकलीफ और परेशानी उठाई थी इस आइसक्रीम के लिए और वोह  उसके आँखों के सामने पिघल रही थी और वोह बेचारा उसे  खा भी नहीं सका था उसे अपनी साँसे रूकती हुई  महसूस हो रही थी उसे समझ नहीं आ रहा था की क्या करे बस अकबक अकबक कर के उसे देखे जा रहा था! तभी एक कुत्ता कहीं से आकर जल्दी जल्दी आइसक्रीम को चाटने लगा गर्मी  थी उसे ठंडा ठंडा अच्छा लग रहा था !वोह कुछ सेकंड उसे देखता रहा जिस आइसक्रीम का वोह इतने दिनों से बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था जिस के लिए उसने क्या क्या झेला था आज उसके सामने मिटटी में पड़ी हुई थी उसका गुस्से से बुरा हाल हो रहा था  फिर उसने सारा गुस्सा उस पत्थर पे निकाला  वोह गुस्से से उठा और एक पत्थर उठाकर   पूरी ताकत से कुत्ते को मारा कुत्ता बेचारा आइसक्रीम खाने में मगन था अचानक से इतनी जोर के पत्थर ने उसका   दिमाग घुमा दिया वोह बेचारा कायं कायं करता गिरता पड़ता भागा!
साले कुत्ते इस आइसक्रीम के लिए मैने कितनी परेशानी उठाई कितनी तकलीफें झेलीं और इसे तू खाएगा जब मैं नहीं खा सका तो कोई नहीं खाएगा! ये ले उसने  गुस्से से आइसक्रीम को पैर से तेज़ तेज़ रगड़कर मिटटी में मिलाया उस पे  भी गुस्सा शांत नहीं हुआ तो बगल से हाँथ में रेत भरकर आइसक्रीम पे डाला और तेज़ तेज़ पैर से रगड़ा ये ले ये ले साले जहन्नम में जा मर फिर गुस्से से  आइसक्रीम पे खूब  थूका और आगे बढ़ गया  !
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