Wednesday, 7 January 2015

क्या वे उन्हें भूल सकती हैं?



मुझे सहसा लगा, यह लड़का अपनी अनिश्चितता में, अपनी नर्वसनेस में- इस लड़की को खो रहा है। मुझे तब अपने बहुत-से मित्र याद हो आए, जो महज अपनी जिद, अपनी अकड़, अपनी हिंस्त्र आक्रामकता में, अपने उन्मत्त पैशन में कितनी आसानी से लड़कियों को पा लेते हैं और उन्हें एक क्षण भी संकोच नहीं होता कि वे उन लड़कियों को अपने उन मित्रों से छीन ले रहे हैं, जो पराजित हो जाते हैं, पीछे हट जाते हैं, इसलिए नहीं कि वे कम 'पोटेंट' हैं, कम मर्द हैं, कम प्रेम करना जानते हैं, बल्कि इसलिए कि वे 'नर्वस' हैं, अनिश्चित हैं, शंकाकुल हैं, इस बात में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं कि उनमें इतना सार्मथ्य है कि किसी लड़की को सुखी बना सकें ('मैं तुमसे प्रेम करती हूं, लेकिन सुनो, मैं तुम्हारे संग सिक्योर महसूस नहीं करती।)

इसलिए जब दूसरे आदमी आते हैं, मज़बूत और मुखर, और अपनी धुन के पक्के .. तो अनायास वे लड़कियां उनके साथ चली जाती हैं, उनसे विवाह करके अपनी गृहस्थी बसा लेती हैं, बच्चे जनती हैं, सबकुछ पा लेती हैं, जो कभी चाहती थीं...

लेकिन कभी-कभी मैं सोचता हूं कि किसी सूनी दुपहर में जब उनका पति अपने कोर्ट, फर्म या दफ्तर में होता है और बच्चे स्कूल जा चुके होते हैं... ये लड़कियां अवश्य खिड़की से बाहर झांकते हुए, या पलंग पर ऊंघते हुए या कोई पुराना गुरुदत्त की फिल्म का गाना सुनते हुए (जो कहीं दूर ढाबे के रेडियो से उनके कमरे में चला आता है) सोचती होंगी उन लड़कों के बारे में जो काफी कच्चे थे, काफी अनिश्चित और चुप्पे-से, दुर्भाग्यवश आत्मग्रस्त, जिन्हें कभी शादी से पहले उन्होंने किसी शाम के झिलमिले में चूमा था...जल्दी, घबराए-से होंठ चेहरे पर आए नए उदास रोयों पर, और आंखें और सांसें और आंखें...वे सो जाती हैं। खिड़की बंद करके लौट आती हैं। क्या वे उन्हें भूल सकती हैं?

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