मैं जब पांचवी क्लास में था तो उस लड़की से पहली बार मिला , अपने नए स्कूल में। उसका नाम सोनी है। हम एक ही जगह पर रहते थे। साथ आना-जाना तो होता ही था , हम पढ़ते भी एक ही क्लास में थे। शुरुआत में तो वह सिर्फ मेरे लिए एक कॉम्प्टीटर थी ,
लेकिन जैसे ही हम हाइयर क्लास में गए धीरे-धीरे मैं उसकी ओर आकर्षित होने
लगा। जब मैं 9वीं क्लास में था तो मेरे दोस्तों को इसकी भनक लग गई और यकीनन
उसे भी इस बात का एहसास अच्छी तरह से हो गया। उसकी एक खास दोस्त ने मुझे
बताया कि वह भी मुझे लाइक करती है , लेकिन ना तो मैंने उसको कभी प्रपोज़ किया और ना ही उसने कभी कुछ कहा।
कुछ ऐसे ही पसोपोश में हमने अपनी ग्रैजुएशन पूरी कर ली। हम एक-दूसरे की फीलिंग्स जानते थे ,
लेकिन हमने कभी एक-दूसके से कुछ नहीं कहा। फिर मैं अपने बेहतर करियर की
तलाश में विदेश चला आया। उसके बाद मुझे लगा कि उसे सब बताने का यही सही
वक्त है। मैंने फोन पर उसे प्रपोज़ किया और उसने बस इतना ही कहा कि कितनी
देर कर दी। हम धीरे-धीरे इस राह पर आगे बढ़ने लगे।
लेकिन कहते हैं न कि हर इंसान को वह सब नहीं मिलता जो वह चाहता है। बस , हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उसके माता-पिता नहीं चाहते थे कि हम शादी करें। मजबूरी में आज हम एक-दूसरे से अलग हैं , फिर भी हमें एक-दूजे से प्यार है। सच ही तो है , प्यार में पाना ही सबकुछ नहीं होता , कभी-कभी कुछ खोना भी पड़ता है।
" ना था मंज़ूर किस्मत को , ना थी मर्जी बहारों की
नहीं तो इस गुलिस्तां में , कमी थी क्या नज़ारों की " ।
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