मेरी मुहब्बत की कहानी कुछ अलग है। यह उस समय की बात है जब मैं बीए कर रहा था। जिस मकान में मैं रहता था, उस मकान मलिक की बेटी से प्यार करने लगा। लेकिन वह मुझे उस नज़र से नही देखती थी। मैं उसकी मुहब्बत में पागल हो गया था। आख़िर एक दिन मैंने इज़हार-ए-मुहब्बत कर ही दिया। लेकिन जवाब वही जिसका डर था। उसने ना कर दी। मेरा तो दिल ही टूट गया। मैं उसके आगे बहुत रोया। इससे उसे लगा कि मेरा प्यार सच्चा है। फिर उसे भी मुझसे मुहब्बत हो गई। हम दोनों बहुत खुश थे। रात में चुपके-चुपके छत पर मिलते थे। हम लोगों ने कभी कोई ग़लती नही की, बस एक-दूसरे की बांहों में समा कर घंटों बात करते थे, साथ-साथ जीने-मरने की कसमें खाते थे।
लेकिन शायद अल्लाह को कुछ और मंजूर था। उसके भाई और पापा को हमारी मुहब्बत नापसंद थी। इसके कारण मुझे वह मकान छोड़ना पड़ा। मैं अपने घर वापस चले आया। इसके बाद सिर्फ़ खत से बात होती थी क्योंकि मिलने-जुलने से रोक दिया गया। फिर भी हम एक-दो महीने मे कभी-कभी चोरी-चोरी मिल लेते थे। आख़िर एक दिन हमारे बिछड़ने का वक़्त आ गया जब मेरी नौकरी सऊदी अरब मे लग गई। मेरे जाने का वक़्त करीब आया तो मैं उसकी ममी से मिला और उनसे इल्तज़ा की। वह मान भी गईं। वैसे भी उसकी ममी मुझे पसंद करती थीं। उन्होंने मुझसे वादा भी किया कि सऊदी अरब से लौटने के बाद वह हम दोनो की शादी करवा देंगी। फिर हम दोनों ने आख़िरी मुलाक़ात की। एक-दूसरे से मिल कर खूब रोए। बिछड़ने की तकलीफ़ हो रही थी मगर भविष्य में एक होने की खुशी भी थी।
कुछ दिन बाद मैं सऊदी अरब चला गया। एक महीना बाद मैंने उसके घर फोन मिलाया लेकिन मुझे उससे बात नहीं करने दी गई। ममी से बात हुई लेकिन वह भी अपने वादे से मुकर गईं। मैंने बहुत सारे खत भी लिखे लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। तीन साल बाद मैं वापस हिन्दुस्तान आया। इस बीच मेरी शादी भी तय हो गई। आज मेरे दो बच्चे हैं। हम खुश हैं। उसकी भी शादी हो गई लेकिन उसे पति अच्छा नहीं मिला जिस कारण मुझे तकलीफ़ होती है। आज भी कभी-कभी याद आती है। शायद लोग सच कहते हैं - पहला प्यार कभी भूलता नहीं।
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